Sawai Title History: भारत के मुगल और राजपूत इतिहास में 'सवाई' उपाधि सम्मान और बुद्धिमत्ता की मिसाल रही है. जय सिंह की हाजिरजवाबी से शुरू हुआ यह संबोधन 1713 में आधिकारिक उपाधि बना. आज भी 'सवाई' नाम शासकों, शहरों और संस्थानों के जरिये राजस्थान की शान बढ़ा रहा है. आज जाइये जानते हैं 'सवाई' नाम देने के पीछे का पूरा इतिहास?
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मुगलकाल और राजपूत इतिहास के रिश्ते सिर्फ जंग और सियासत तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सम्मान, प्रतिष्ठा और बुद्धिमत्ता की मिसालें भी इस दौर में देखने को मिलती हैं. राजपूत शाही खानदान आज भी जिस 'सवाई' उपाधि को फख्र से याद करता है, उसके पीछे एक दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी छिपी है. यह कहानी है जय सिंह की, जिनकी सूझबूझ और हाजिरजवाबी ने मुगल दरबार में खास पहचान बनाई और जिनका नाम सदियों बाद भी इतिहास के पन्नों में पूरे इज्जत व ऐहतराम के साथ लिया जाता है.
जय सिंह की पढ़ाई, उनकी उम्र आठवें साल में कुछ समय के लिए बाधित हो गई थी. इस दौरान उन्हें अपने वालिद की जगह दक्कन जाना पड़ा. उनके वालिद मुगल दरबार में जाने से हिचक रहे थे.जय सिंह के वालिद ने जीनत-उन-निसा बेगम की मदद से मथुरा में ही रहने की इजाजत हासिल कर ली थी. जीनत-उन-निसा बेगम मुगल बादशाह की दूसरी बेटी थीं और शहजादा आजम शाह की समर्थक मानी जाती थीं.
'सवाई' उपाधि की क्या है कहानी?
अप्रैल 1969 में जय सिंह बादशाह के शिविर में पहुंचे. वहां एक प्रसिद्ध मुलाकात के दौरान उनकी हाजिरजवाबी से प्रभावित होकर मुगल बादशाह ने उन्हें 'सवाई' की उपाधि दी. यही उपाधि आगे चलकर पूरे देश में जय सिंह की पहचान बन गई. हालांकि, समकालीन पत्रों से यह साफ होता है कि जय सिंह को आधिकारिक तौर पर 'सवाई'की उपाधि जुलाई 1713 में मुगल बादशाह फर्रुखसियर के जरिये दी गई थी. इसका जिक्र राजस्थान यूनिवर्सिटी में इतिहास के व्याख्याता वी. एस. भटनागर ने अपनी किताब 'LIFE AND TIMES OF SAWAI JAI SINGH-1688–1743' किया है.
इससे पहले भी कुछ पत्रों में उनके नाम के साथ 'सवाई' लिखा हुआ मिलता है, लेकिन ये सभी निजी किस्म के पत्र थे और इन्हें कम हैसियत वाले लोगों ने लिखा था. इससे सिर्फ इतना पता चलता है कि औरंगजेब के जरिये जय सिंह को 'सवाई' कहे जाने की कहानी उस समय प्रचलन में आ चुकी थी, लेकिन सरकारी तौर पर यह उपाधि इस्तेमाल में नहीं आई थी.
1713 से पहले भेजे गए पत्रों में महाराणा अमर सिंह, महाराणा संग्राम सिंह, महाराजा अजीत सिंह, दुर्गादास, राजा छत्रसाल बुंदेला और अन्य कई प्रमुख हस्तियों ने जय सिंह को कभी 'सवाई' कहकर संबोधित नहीं किया. वे उन्हें अपने पत्रों में सिर्फ "महाराजा श्री जय सिंहजी" या "महाराजाधिराज महाराजा श्री जय सिंहजी" लिखकर संबोधित करते थे.
यहां तक कि जय सिंह के अपने वकील जगजीवनदास पंचोली भी अपनी रिपोर्टों में उन्हें "श्री महाराजाधिराज महाराजाजी श्री जय सिंह" ही लिखते थे. उन्होंने पहली बार 'सवाई' की उपाधि का इस्तेमाल 12 जुलाई 1713 की अपनी रिपोर्ट में किया, जिसमें उन्होंने अपने स्वामी को मुगल बादशाह के जरिये यह उपाधि दिए जाने की जानकारी दी थी. इस तरह इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि 'सवाई' की उपाधि, जिसे आज भी राजस्थान का राजपूत शाही खानदान फख्र से याद करता है, पहले एक चर्चित किस्सा बनी और बाद में मुगल बादशाह की मुहर के साथ आधिकारिक सम्मान के रूप में दर्ज हुई.
'सवाई' के इतिहास से जुड़ी यह जगहें आज भी बढ़ा रही हैं शोभा
यह उपाधि न सिर्फ शासकों की असाधारण क्षमता का प्रतीक बनी, बल्कि समय के साथ भारत के कई शहरों, संस्थानों और ऐतिहासिक स्थलों की पहचान भी बन गई. जयपुर रियासत के इतिहास में सबसे पहले सवाई जय सिंह सेकेंड का नाम आता है, जिन्हें जयपुर का संस्थापक और महान खगोलशास्त्री माना जाता है. उनके बाद सवाई ईश्वरी सिंह, सवाई माधो सिंह प्रथम, सवाई प्रताप सिंह, सवाई जगत सिंह, सवाई जय सिंह थर्ड, सवाई राम सिंह सेकेंड, सवाई माधो सिंह सेकेंड और सवाई मान सिंह सेकेंड जैसे शासकों ने इस उपाधि को आगे बढ़ाया.
इनमें सवाई प्रताप सिंह के जरिये बनवाया गया हवा महल, सवाई राम सिंह सेकेंड के सुधार और फोटोग्राफी के प्रति योगदान, सवाई माधो सिंह सेकेंड के जरिये आधुनिक जयपुर के विकास को आज भी ऐतिहासिक उपलब्धि माना जाता है. सवाई मान सिंह सेकेंड स्वतंत्र भारत में जयपुर के अंतिम महाराजा रहे.
'सवाई' सिर्फ शासकों तक सीमित नहीं रही. समय के साथ यह नाम शहरों, अस्पतालों, स्टेडियमों और सांस्कृतिक संस्थानों से भी जुड़ गया. राजस्थान का मशहूर शहर सवाई माधोपुर, जो आज रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के लिए दुनियाभर में जाना जाता है, इसी परंपरा का हिस्सा है. जयपुर का सवाई मान सिंह अस्पताल राज्य के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता है, जबकि सवाई मानसिंह स्टेडियम खेल जगत में अपनी अलग पहचान रखता है. इसके अलावा सवाई राम सिंह शिल्प कला मंदिर और सवाई माधो सिंह संग्रहालय जैसे संस्थान भी इस ऐतिहासिक नाम को आगे बढ़ा रहे हैं.
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