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मुसलमानों के आख़िरी नबी मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) मुसल्ले पर शुक्र अदा कर रहे थे. उनके दामाद हजरत अली के चेहरे पर मुस्कुराहट थी. उनके नवासे हसन ख़ुशियों से झूम रहे थे. घरवाले ख़ुशियों से एक दूसरे को मुबारबाद दे रहे थे. नबी की बेटी हजरत फ़ात्मा ज़हरा की गोद में क़ुदरत ने चांद से बेटे का तोहफ़ा अता किया था. फ़ात्मा ज़हरा के घर ये दूसरे बेटे की आमद थी. इसके बाद दो बेटियाँ और हु ज़ैनब और उम्मे कुलूसम.
हजरत फ़ात्मा ज़हरा हज़रत मुहम्मद (स.अ.) की चहेती बेटी थीं. बाप ने बेटी को बड़े नाज़ों से पाला था. जिस दौर में अरब बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर देते थे, उस दौर में मुहम्मदे अरबी ने अपनी बेटी की ताज़ीम करके बेटियों से मुहब्बत का दर्स सारे अरब को दिया. वक़्त गुज़रता गया. बाप की चाहतों के आसमान तले चहेती बेटी बड़ी हुई.
बीबी फ़ात्मा के लिए बड़े बड़े घरानों से शादी के लिए रिश्ते आने लगे. मुहम्मद अरबी हर पेशकश को टालते रहे. इधर सरदारे क़ुरैश हज़रत अबू तालिब के बेटे इमाम अली भी बड़े हो चुके थे और मुहम्मदे अरबी के शाना ब शाना साये की तरह साथ रहने लगे. मुहम्मद और अली की एक दूसरे के लिए मुहब्बत और अक़ीदत किसी से छुपी नहीं थी.
अली को उनके कुछ साथियों ने मशविरा दिया कि आप भी अपनी बीबी फातिमा से निकाह की पेकशक करें. इमाम अली ने जवाब दिया कि जब बड़े-बड़े शहज़ादों के पैग़ाम का कोई जवाब नहीं मिला तो, मैं तो एक मेहनतकश मज़दूर हूं. मेरे पास क्या हैं ? लेकिन साथियों ने इसरार किया तो अली ने अपनी ख़्वाहिश रसूलअल्लाह से ज़ाहिर की. रिश्ता क़ुबूल हुआ. शादी हुई.
ज़िदंगी ख़ुशगवार गुज़रने लगी. जो देखता वही कहता कि ये जोड़ा फ़र्श नहीं अर्श पर बना है. ज़माना तेज़ी से बदलता गया. फ़ात्मा ज़हरा के बेटों को नाना मुहम्मद ने नवासों की तरह नहीं, बल्कि अपने बच्चों की तरह पाला. मस्जिद जाते तो हसन और हुसैन साथ. महफ़िल में शरीक होते तो दोनो नवासे साथ होते थे. बाज़ार जाते तो दोनो नवासे साथ जाते थे. मुहब्बतों , शफ़क़तों, दुलार और प्यार के साथ नवासों की परवरिश हुई थी.
लेकिन दुनिया में हमेशा कौन रहता है. मौत बरहक़ है. अली की गोद में मुहम्मदे मुस्तफ़ा ने आख़िरी सांसें लीं. बच्चे क़दमों से लिपटे रो रहे थे. फ़ात्मा ज़हरा के घर में सफ़े मातम बिछ गया. पैग़म्बरे आज़म के बाद तो दुनिया ही बदल गई. घरवालों से लोगों ने ऐसे नज़रे फेर लीं जैसे पहचानते ही न हों. अभी नाना के ग़म में बच्चों के आंसू सूखे भी नहीं थे कि प्यारी मां की जुदाई का ग़म भी उठाना पड़ा. चहेते बच्चे, नाज़ों से पाले बच्चें बड़ों के बग़ैर बाबा अली के साथ उदास-उदास ज़िदंगियां गुज़ारने लगे.
अली ने भी बड़ी ज़िम्मेदारी और मेहनत से अपने बच्चों को पाला था. मदीना छोड़ अली बच्चों के साथ इराक़ के शहर कूफ़ा आ गए. लेकिन ख़ानदाने मुहम्मद के दुश्मन पीछा करते हुए वहां भी पहुंच गए. एक रोज़ अली सुबह की नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद गए कि वहीं हमलावर ने आप पर ज़हर में बुझी तलवार से ऐसा हमला किया कि आप ज़ख़्मों की ताब न ला सके और हमले के तीसरे दिन शहीद हो गए. अली के यतीम बच्चों का अब कोई सहारा नहीं रहा. बच्चे वापस मदीने लौट गए, लेकिन यहां भी उन्हे सुकून से नहीं रहने दिया गया.
बुज़ुर्गों के बाद बच्चों पर गहरा सदमा उस वक़्त गुज़रा जब बड़े भाई हसन को ज़हर दे कर शहीद कर दिया गया. यहीं से कर्बला वाले हुसैन का इम्तिहान शुरु हो गया. वो ही हुसैन जिसकी विलादत पर झूमे थे मुहम्मद. ख़ुश हुए थे अली. सजदे में गईं थीं माँ फ़ात्मां. झूमे हसन. ज़माने ने मुहम्मद और अली की दुश्मनी का बदला हुसैन से लेने का फ़ैसला किया. आगे पढ़ें क्यों हुसैन को मदीना छोड़ना पड़ा और किसने हुसैन से बैयत तलब की ?
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