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Muharram 2026: इस्लाम के नए साल के पहले महीना मुहर्रम का आगाज हो चुका है. मजहबी ऐतबार से मुहर्रम का माह काफी मुकद्दस और पाक माना जाता है. इतिहास में 10 मुहर्रम का दिन सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि सच्चाई, बहादुरी और कुर्बानी की ऐसी मिसाल है, जिसने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि इंसाफ के सामने सिर झुकाने से बेहतर है कि इंसान सच के रास्ते पर डटा रहे.
कर्बला की घटना आज भी लोगों को ईमान, त्याग और इंसाफ की लड़ाई लड़ने की प्रेरणा देती है. 60 हिजरी में यजीद ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ली और उसने अलग-अलग इलाकों में लोगों से अपनी बैअत यानी निष्ठा की शपथ लेने के लिए संदेश भेजे. मदीना के शासक ने भी हजरत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु से यजीद के प्रति वफादारी की शपथ लेने को कहा, लेकिन इमाम हुसैन ने साफ इनकार कर दिया.
इमाम हुसैन ने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि उन्होंने यजीद के जुल्म, उसके गलत कामों और उसके अखलाक को देखा था. उनका मानना था कि ऐसे शख्स का समर्थन नहीं किया जा सकता जो इंसाफ और मजहब के रास्ते से भटक चुका हो.
इसी वजह से यजीद, इमाम हुसैन (रजि.) का विरोधी बन गया. उसके आदेश पर कूफा के पास स्थित कर्बला के मैदान में उसकी 22 हजार फौजियों का लश्कर इकट्ठा हो गया. दूसरी ओर इमाम हुसैन (रजि.) के साथ सिर्फ 72 साथी थे. संख्या में बेहद कम होने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने के बजाय सच का साथ देना चुना.
कर्बला की इस ऐतिहासिक घटना में इमाम हुसैन के साथी एक-एक करके अल्लाह की राह में शहीद होते गए. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने मकसद से पीछे नहीं हटे. 10 मुहर्रम, 61 हिजरी, जो शुक्रवार का दिन था, उस दिन इमाम हुसैन ने असाधारण साहस और वीरता का परिचय देते हुए सत्य के लिए लड़ते-लड़ते शहादत स्वीकार कर ली. उन्होंने आखिर तक तक यजीद जैसे नाकारा शख्स के सामने झुकने से इनकार कर दिया.
कर्बला की इस घटना से कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं. आशूरा की कहानी बताती है कि जुल्म और नाइंसाफी के सामने डटे रहना कितना जरूरी है. इमाम हुसैन (रजि.) का पुख्ता यकीन और सब्र आज भी लोगों को इंसाफ और सच्चाई के लिए खड़े होने की प्रेरणा देता है. कुर्बानी, रहमदिली और दृढ़ता जैसे मूल्य हर दौर में प्रासंगिक बने हुए हैं.
मुहर्रम का महीना हर साल लोगों को कर्बला के शहीदों, खासकर पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे और शहीदों के सरदार इमाम हुसैन (रजि.) की याद दिलाता है. 10 मुहर्रम, 61 हिजरी को हुई यह जंग इतिहास में हक और बातिल के बीच की सबसे अहम वाकयों में से एक मानी जाती है.
कर्बला के शहीदों ने यह संदेश दिया कि बुराई के सामने कभी घुटने नहीं टेकने चाहिए और जरूरत पड़ने पर मजहब और सच्चाई की रक्षा के लिए अपना जिंदगी न्योछावर करनी पड़े, तो उससे हिचकिचाना नहीं चाहिए. इस घटना से एक और बड़ी सीख मिलती है कि दुनियावी ऐशो-आराम हमेशा सबसे अहम नहीं होते हैं.
अगर इमाम हुसैन (रजि.), यजीद की बैअत स्वीकार कर लेते, तो पूरी फौज उनके सामने झुक जाती, उन्हें सम्मान मिलता, खजाने सौंप दिए जाते और दुनिया की तमाम दौलत उनके कदमों में रख दी जाती. लेकिन इमाम हुसैन (रजि.) का दिल दुनियावी लालच और ख्वाहिशों से आजाद थे. जिनके लिए सच्चाई और उसूल सबसे ऊपर थे, उनके लिए दौलत और शोहरत की कोई अहमियत नहीं थी.