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Muharram 2026: इस्लामी साल की शुरुआत मुहर्रम से होती है, लेकिन यह महीना सिर्फ नए साल का आगाज नहीं है. यह महीना मुसलमानों को सब्र, शुक्र, इबादत और सच्चाई के रास्ते पर डटे रहने का संदेश देता है. खास तौर पर 10 मुहर्रम, जिसे "यौमे आशूरा" कहा जाता है, दुनिया भर के मुसलमानों के लिए बेहद अहम दिन माना जाता है. यह दिन कई ऐतिहासिक घटनाओं, मजहबी तालीम और अजीम कुर्बानियों से जुड़ा हुआ है, जिसकी वजह से इसकी अहमियत सदियों से कायम है.
क्या है "आशूरा" के मायने?
यौमे आशूरा इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. "आशूरा" शब्द अरबी भाषा के शब्द "अशरा" से निकला है, जिसका मतलब "दस" होता है. इसी वजह से मुहर्रम की 10वीं तारीख को यौमे आशूरा कहा जाता है. यह दिन मुसलमानों के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाने वाला मौका है.
यौमे आशूरा में इबादत की फजीलत?
इस दिन से जुड़े मजहबी, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलू इस्लामी दुनिया में आज भी उतने ही अहम समझे जाते हैं. इस्लामी रिवायतों के मुताबिक, यौमे आशूरा उस दिन की याद भी है, जब अल्लाह ने हजरत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इसराईल को फिरऔन के जुल्म से बचाया था.
बताया जाता है कि अल्लाह के हुक्म से समुद्र दो हिस्सों में बंट गया और हजरत मूसा अलैहिस्सलाम अपने लोगों के साथ सुरक्षित निकल गए. इस अजीम वाकये की याद में "रोजा" रखा जाता है. पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी इसे अल्लाह का शुक्र अदा करने का तरीका बताया और इस दिन रोजा रखने की अहमियत को स्वीकार किया.
रिवायतों के मुताबिक, यह दिन बनी इसराईल के लिए ईद का दिन भी था. यह भी बताया जाता है कि हजरत मूसा अलैहिस्सलाम, यौमे आशूरा के दिन महीन सन के कपड़े पहनते थे और आंखों में इस्मिद नाम का सुरमा लगाते थे.
इमाम हुसैन (रजि.) ने इसी माह में नाइंसाफी और जुल्म का किया मुकाबला
यौमे आशूरा का सबसे गहरा और रूहानी ताल्लुक पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत से भी जुड़ा है. 680 ईस्वी में कर्बला की जंग के दौरान इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने यजीद की हुकूमत के सामने झुकने से इनकार कर दिया था. उन्होंने नाइंसाफी और जुल्म के खिलाफ डटकर मुकाबला किया और आखिरकार अपनी जान कुर्बान कर दी.
इस्लामी इतिहास में उनकी यह कुर्बानी एक निर्णायक घटना मानी जाती है. यह शहादत इंसाफ, सच्चाई और जुल्म के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है. इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु का संदेश आज भी लोगों को यह सिखाता है कि किसी भी हाल में नाइंसाफी का समर्थन नहीं करना चाहिए.
मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे बेहद बरकत और महानता वाला महीना माना जाता है. खास तौर पर इसकी 10वीं तारीख यानी यौमे आशूरा को इस्लाम में असाधारण महत्व दिया गया है.
"यौमे आशूरा पर पैगंबर इस्लाम भी रखते थे रोजा"
हदीसों के मुताबिक, पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुद इस दिन रोजा रखते थे. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने साथियों को भी इस दिन रोजा रखने का हुक्म दिया था. इसका जिक्र सहीह बुखारी की रिवायतों में मिलता है. बताया जाता है कि इस्लाम आने से पहले भी लोग इस दिन का सम्मान करते थे और रोजा रखते थे. यही वजह है कि यौमे आशूरा को इबादत, शुक्र और आध्यात्मिक चिंतन का दिन माना जाता है.
उलेमा, इस मौके पर मुसलमानों को मशविरा देते हैं कि 10 मुहर्रम के दिन रोजा रखें और ज्यादा से ज्यादा इबादत करें. यह दिन इंसान को अल्लाह का शुक्र अदा करने, सब्र अपनाने, सच्चाई का साथ देने और अपने जिंदगी को बेहतर बनाने का संदेश देता है. यौमे आशूरा की अहमियत सिर्फ इतिहास तक सीमित नहीं है. यह दिन हर पीढ़ी को यह याद दिलाता है कि इंसाफ, सब्र, शुक्र और कुर्बानी जैसे मूल्यों को अपने जिंदगी में अपनाना कितना जरूरी है. यही वजह है कि दुनिया भर के मुसलमान इस दिन को अकीदत, ऐहतराम और इबादत के रूप में याद करते हैं.