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Episode 8: ये आख़िरी रात थी. अजब बेक़रारी में मुहम्मद के नवासों ने रात गुज़ारी. अजब रात थी. आंधी ऐसे चल रही थी कि दिल तोह बाला हो रहे थे. चिराग़ बुझे जा रहे थे. बच्चे माओं की गोद में सहमें हुए थे. इन सब में सबसे ज़्यादा हुसैन इब्ने अली की बहन ज़ैनब बिन्ते अली परेशान थीं. मुसलसल आँखों से आँसू जारी थे. किसी कल उन्हें चैन नहीं था.
इधर, हुसैन के ख़ैमें में सारे दोस्त, अहबाब, भांजे, बेटे भतीजे जमा थे, जिन्हें बैठने की जगह नहीं मिली वो खड़े थे. ख़ैमे के सारे पर्दे उठा दिए गए. सबने एक ज़बान होकर वफ़ादारी और जांनिसारी की क़समें खाईं. हुसैन इब्ने अली ने बड़े प्यार से अपने साथियों पर नज़रें दौड़ाईं. दोस्तों, तुम्हें इस मुसीबत में अपने पास पाकर नाज़ हो रहा है. मेरा सर हौसलों से बुलंद है. फिर हुसैन ने हुक्म दिया कि ख़ैमे के सारे चराग़ बुझा दिए जाएं.
अंदर-बाहर घोर अंधेरा छा गया. बस इमाम हुसैन की आवाज़ बुलंद हुई. दोस्तों, मुझे वतन छोड़ने पर मजबूर किया गया, और अब मैं अपने नाना के शहर से दूर एक अनजान मक़ाम पर हूँ. सोचा था शायद यहां मुझे अमान मिल जाए, लेकिन अब ये उम्मीद भी ख़त्म हो गई है. बस अब मैं तुमसे अपने अहदों के पैमान उठाए लेता हूँ. तुम्हे इतात के बार से सुबुक दोश करता हूं, और तुम सबको ख़ुशी-ख़ुशी इजाज़त देता हूं, जिस तरफ़ पनाह मिले चले जाओ.
रात का वक़्त है. अंधेरा छाया हुआ है. अपनी-अपनी सवारियां तैय्यार करो और सुबह के उजाले से पहले निकल जाओ. मेरे दोस्तों मेरे अज़ीज़ो मैने चिराग़ बुझा दिए हैं. इस अंधेरे में किसी को कोई न देखागा. न तो जाने में किसी तरह की शर्मिंदगी होगी. न मुरव्वत का एहसास. इमाम ने बात तमाम की.
ख़ैमे में सन्नाटा छाया रहा. किसी ने पहलू तक नहीं बदला. देर तक ख़ामोशी के बाद हुसैन ने चिराग़ फिर रोशन किया. सब उसी तरह अपनी-अपनी जगह पर मौजूद थे. कोई अपनी जगह से हिला तक नहीं. ख़ैमे में अभी भी सन्नाटा छाया रहा. फिर अब्बास ने तमाम दोस्तों की तरफ़ से नुमाइंदगी की.
अब्बास जैसा बहादुर, वफ़ादार और जवान सिपाहलार रोने लगा. कहा- आक़ा ख़ुदा न करे कि हम आपके बाद ज़िंदा रहें. एक-एक करके सारे दोस्तों ने रोते हुए अपनी वफ़ादारी का इज़हार किया. हुसैन की आंखों से आंसू जारी होने लगे. परवरदिगार जैसे दोस्त मुझे मिले न मेरे नाना मुहम्मद को मिले न मेरे बाबा अली को मिले. बारी-बारी से सबको गले लगाया. मेरे प्यारो कल हमारे हिस्से में सिर्फ़ शहादत है. क़सम ख़ुदा की मैं अपने लिए वतन छोड़ कर नहीं आया हूं. मैं अपने नाना के दीन की इस्लाह के लिए निकला हूं. मुझ जैसा यज़ीद जैसे की बैयत हरगिज़ न करेगा.
रात ढलने लगी. चिराग़ की रौशनी मद्धम पड़ने लगे. 10 मोहर्रम की सुब्ह दस्तक देने वाली थी कि इमाम हुसैन ने बेटे अली अकबर को सुबह की नमाज़ के लिए अज़ान देने का हुक्म दिया. अली अकबर ने अज़ान दी. नमाज़-ए-फ़ज़्र अदा हुआ. नमाज़े फ़ज्र से नमाज़े अस्र के बीच हुसैन इब्ने अली और उनके 71 साथियों को ज़ालिमों ने शहीद कर दिया. हुसैन इब्ने अली सबसे आख़िर में शहीद किए गए.
10 मोहर्रम का शर्मिंदा सूरज डूब गया.कर्बला के मैदान में मुहम्मद की बेटियाँ.अली की बहूएं.बिना वाली ओ वारिस के अकेले हो गईं.यज़ीदी फ़ौज ने इन बीबीयों के ख़ैमों में आग लगा दी. इनके सरों से चादरें छीन ली गई. इन्हें क़ैदी बनाया गया.इन्हें कर्बला से सीरिया लाया गया. मुहम्मद की बेटियों को बज़ारों में फिराया गया और यज़ीद के दरबार में लाया गया.फिर उन्हें क़ैद ख़ाने में डाल दिया गया.
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