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Zee SalaamZee Salaam ख़बरेंOpinion: 53 मौतें और हजारों जख्म…छह साल बाद भी क्यों नहीं भर पाए दिल्ली दंगों के घाव?

Opinion: 53 मौतें और हजारों जख्म…छह साल बाद भी क्यों नहीं भर पाए दिल्ली दंगों के घाव?

North East Delhi Riots 2020: आज से ठीक 6 साल पहले दिल वालों की दिल्ली दहल उठी थी, जब हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल पेश करने वाले लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए. 23 फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की यादें आज भी जाफराबाद, मौजपुर और शिव विहार जैसे इलाकों में जिंदा हैं. हिंसा में 53 लोगों की मौत, सैकड़ों घायल और भारी नुकसान हुआ. छह साल बाद इलाके की तस्वीर बदल गई, लेकिन लोगों के दिलों में डर और अविश्वास अभी भी कायम है.

 

छह साल बाद भी उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों को याद कर सिहर उठते हैं मुसलमान (PC-Social Media)
छह साल बाद भी उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों को याद कर सिहर उठते हैं मुसलमान (PC-Social Media)

North East Delhi Riots 2020 Anniversary: देश की राजधानी दिल्ली अपनी भव्यता और इतिहास को लेकर पूरी दुनिया में मशहूर है. लेकिन 23 फरवरी 2020 की वह सर्द रात आज भी उत्तर-पूर्वी दिल्ली की गलियों में एक खामोश याद की तरह मौजूद है. जाफराबाद, मौजपुर, चांद बाग और शिव विहार, जहां कभी शाम को बच्चे क्रिकेट खेलते थे, कुछ ही घंटों में हिंसा की आग में घिर गया. धमाकों की तेज आवाज से दीवारें कांप उठीं. पहले पत्थर चले, फिर गोलियां और देखते ही देखते आग की लपटों ने आसमान को लाल कर दिया.

यह किसी दूर देश की जंग नहीं थी, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली की सच्चाई थी. संकरी गलियों में दोनों ओर सटे घरों की छतों पर लोग खड़े थे. हाथों में पत्थर थे और नीचे भागती भीड़. कहीं 'बचाओ' की चीख सुनाई देती, तो कहीं नारेबाजी. गोलियों की आवाजें हवा को चीरती हुई दिलों में डर भर रही थीं. कई घरों में मांयें अपने बच्चों को सीने से लगाए अंधेरे कमरों में बैठी थीं. पिता दरवाजे के पास खड़े थे, हाथ में डंडा, मन में भय. कई इलाकों में बिजली गुल थी. बाहर सिर्फ आग की रौशनी और चीखों की गूंज थी.

24 फरवरी की सुबह जब सूरज निकला, तो उसने राख से ढकी गलियां देखीं. जली हुई मोटरसाइकिलें, टूटी खिड़कियां और सड़क पर बिखरे जूते, मानो लोग जान बचाकर भागे हों. लेकिन दिन निकलने के बाद भी हालात शांत नहीं हुए. पत्थरबाजी और फायरिंग जारी रही. कई घरों में आग लगा दी गई. फरवरी 2020 की इस हिंसा में कुल 53 लोगों की मौत हुई, जिनमें 40 मुसलमान और 13 हिंदू शामिल थे. मानवाधिकार संगठन और आम लोगों का कहना है कि मौत का आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है. अस्पतालों में घायल लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. स्ट्रेचर पर खून से लथपथ लोग लाए जा रहे थे. बाहर परिजन रो रहे थे. डॉक्टरों के चेहरे पर थकान और सन्नाटा साफ दिख रहा था. ड्यूटी के दौरान एक पुलिसकर्मी की भी मौत हुई और कई पुलिसकर्मी घायल हुए.

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इस हिंसा में सैकड़ों लोग घायल हुए और करोड़ों की संपत्ति जलकर खाक हो गई, इनमें से कई लोगों के जिस्म पर अभी भी इस हिंसा के निशान हैं और शायद हमेशा रहेंगे. पुलिस ने हिंसा के मामले में 758 एफआईआर दर्ज की और दो हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया.  हिंसा के दौरान उत्तराखंड के एक बच्चे को दुकान में जिंदा जला दिया गया. एक नौजवान का शव नाले से मिला, जिसके शरीर पर कई चोटों के निशान थे. ये घटनाएं सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि बिखरते परिवारों की कहानियां थीं.

रात के समय लोग घरों की बत्तियां बंद कर मोबाइल की हल्की रोशनी में फुसफुसाते थे, "हम अभी सुरक्षित हैं, लेकिन कब तक?" कई परिवारों ने हमेशा के लिए अपना घर छोड़ दिया. राहत शिविरों में सैकड़ों लोग ठहरे. बच्चों ने पहली बार महसूस किया कि घर भी छूट सकता है और पड़ोसी भी कभी-कभी अजनबी हो सकते हैं. छह साल बाद उन्हीं इलाकों की तस्वीर बदली हुई नजर आती है. घरों को दोबारा बनाया गया है, दीवारों पर नया रंग चढ़ा है, दुकानें फिर से खुल गई हैं. कई गलियों में मजबूत और ऊंचे लोहे के गेट लगाए गए हैं. घरों पर सीसीटीवी कैमरे दिखते हैं.

लेकिन जब स्थानीय लोगों से पूछा जाता है, "क्या अब सब ठीक है?", तो जवाब से पहले एक लंबी चुप्पी दिखाई देती है और आंखों में अनजाना सा डर दिखाई पड़ता है. पहले जहां त्योहारों पर एक-दूसरे के घर मिठाइयां भेजी जाती थीं, वहां अब औपचारिक मुस्कान है पर भरोसा पहले जैसा नहीं दिखाई पड़ रहा है. 2020 की वह हिंसा सिर्फ ईंट पत्थर नहीं जला गई, बल्कि रिश्तों और यादों पर भी गहरी छाप छोड़ गई. 53 मौतें, सैकड़ों घायल और अनगिनत लोग आज भी उस दौर को याद कर सिहर उठते हैं. धुआं अब आसमान में नहीं दिखता, लेकिन उस समय की घटनाएं अब भी इन गलियों की यादों में दर्ज हैं.

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