)
आम तौर पर बदनाम गलियों की गुमनाम जिंदगी गुजार रही सेक्स वर्करों के बच्चों को समाज में इज्जत नहीं मिल पाती, लेकिन इन्हीं गुमनाम गलियों के बच्चों के लिए आज 'जुगनू' आवाज बन गया है. 'जुगनू' एक त्रैमासिक हाथ से लिखी जाने वाली पत्रिका है, जिसके लेखक सेक्स वर्करों के बच्चे हैं.
सेक्स वर्करों का मानना है कि आज यहां के बच्चे कड़ी मेहनत कर ऊपर उठने की कोशिश कर रहे हैं. मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज में पली बढ़ी और सामाजिक कामों के लिए पहचानी जाने वाली नसीमा खातून की पहल से इस पत्रिका की शुरूआत 1994 में की गई थी.
नसीमा खातून कहती हैं कि 'जुगनू' की शुरूआत के पीछे पसमांदा तबके की बेटियों के उस डर की कसक थी जो उन्हें अपनी किसी भी परेशानी के हल के लिए मुख्यधारा के समाज या मीडिया वालों से मिलने से रोकती थी. डर समाज के उन सभी लोगों से भी था जिन्होंने इस बदनाम गली की बेटियों के हुनर व इल्म को हमेशा से ताक पर रखा.
नसीमा खातून ने कहा कि तब सवाल था कि ये बेटियां समाज में अपना हुनर व इल्म साबित करना चाहती थीं लेकिन ये समाज के सामने खुलकर आया जाय तो किसके भरोसे? उन्होंने कहा कि इस डर को धक्का देकर आगे बढ़ने और समाज के सामने खुल कर, अपने तरीके से और अपनी ही जुबान में अपने हौसले, हुनर और सपनों को पेश करने की जद्दोजहद से जुगनू की पैदाइश हुई.
शुरूआती दौर में 'जुगनू' नाम की एक त्रैमासिक केवल छह पन्नों की थी, लेकिन कालांतर में लोगों की पसंद बनती चली गई और यह आज 36 पन्नों तक पहुंच गई. इस पत्रिका का नसीमा संपादन करती हैं और सेक्स वर्कर्स के बच्चों की तरफ से लेख छापे जाते हैं. पहले जुगनू पत्रिका बिहार से छपती थी लेकिन आज भारत के चार राज्यों राजस्थान, भोपाल, बिहार, महाराष्ट्र से हो रही है.
Zee Salaam Live TV: