Pranpur Assembly Elections 2025: बिहार में विधानसभा इलेक्शन होने हैं. इस बीच कटिहार जिले की प्राणपुर विधानसभा सीट की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं आखिर मुसलमानों की आधी आबादी होने के बावजूद 1985 के बाद अब तक कोई मुस्लिम विधायक क्यों नहीं बन पाया? आइए जानते हैं इस विधानसभा के समीकरण....
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Pranpur Assembly Elections 2025: बिहार में इसी साल असेंबली इलेक्शन 2025 होने हैं. इस बीच सीमांचल की सीटें एक बार फिर सुर्खियों में हैं. कटिहार ज़िले की प्राणपुर विधानसभा सीट की चर्चा इसलिए ज़्यादा हो रही है क्योंकि यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग आधी है, लेकिन मुस्लिम बहुल यह सीट मुस्लिम नेतृत्व की स्थायी पहचान नहीं बन पाई है. हर बार यह सवाल उठता है कि आधी आबादी होने के बावजूद मुस्लिम मतदाता किंगमेकर की भूमिका में क्यों नहीं हैं.
दरअसल, प्राणपुर विधानसभा सीट 1977 में परिसीमन द्वारा बनाई गई थी. यह विधानसभा पूरी तरह से ग्रामीण क्षेत्र है, जिसमें आजमनगर और प्राणपुर प्रखंड शामिल हैं. यहां की जमीन बेहद उपजाऊ है, जहां दालें, जूट, केला, धान, मक्का और पान की खेती होती है लेकिन बाढ़ का खतरा हर साल यहां के लोगों का भविष्य तय करता है. औद्योगिक विकास की कमी और बेरोजगारी के कारण बड़ी संख्या में लोग खाड़ी देशों, दिल्ली, पंजाब और मुंबई की ओर पलायन करते हैं. यही वजह है कि चुनावों के दौरान रोजगार और पलायन यहां के मुख्य मुद्दे रहते हैं.
साल 2020 में इस सीट पर वोटर्स की संख्या 3,05,685 थी, जिसमें करीब 46.8 फीसद मुस्लिम, 8.2 फीसद अनुसूचित जाति और 7.84 फीसद अनुसूचित जनजाति वोटर्स हैं. साल 2024 तक यह संख्या बढ़कर 3,15,030 हो गई थी. यहां के राजनीतिक समीकरण का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मुस्लिम वोटर लगभग आधा होने के बावजूद सिर्फ दो बार मुस्लिम कैंडिडेट ने जीत हासिल की है. 1980 में मोहम्मद शकूर और 1985 में मंगन इंसान, दोनों कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे और जीत हासिल की.
ज्यादा मुस्लिम आबादी लेकिन बीजेपी की जीत
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव क्यों नहीं जीत पाते? आइए जानते हैं. दरअसल, सीमांचल की दूसरे सीटों की तरह प्राणपुर में भी मुस्लिम वोटर एकजुट होकर किसी एक उम्मीदवार को वोट नहीं देते. जातीय आधार, स्थानीय समीकरण और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ मुस्लिम समाज को कई हिस्सों में बांट देती है. एक बड़ा वर्ग कांग्रेस की परंपरागत राजनीति से जुड़ा रहा है. वहीं, नौजवान अक्सर आरजेडी या नए विकल्पों की तरफ आकर्षित होता है. जबकि बीजेपी या जदयू के साथ भी मुस्लिम समुदाय का एक छोटा हिस्सा जुड़ा है.
मुस्लिम कैंडिडेट की हुई थी हार
मुस्लिम वोटर्स में इस बिखराव का फायदा बीजेपी और अन्य दलों को मिलता रहा है. 2020 में कांग्रेस के तौकीर आलम हार गए. जबकि मुस्लिम चाहते तो यहां से कांग्रेस कैंडिडेट की जीत होती लेकिन बीजेपी की उम्मीदवार निशा सिंह मात्र 2,972 वोटों से विजयी हुईं. यह हार मुस्लिम वोटों के विभाजन की सीधी गवाही थी. साल 2024 के लोकसभा इलेक्शन में कांग्रेस के तारिक अनवर ने कटिहार संसदीय क्षेत्र में NDA गठबंधन और जदयू कैंडिडेट को मात दी. इसमें प्राणपुर विधानसभा क्षेत्र से भी महागठबंधन को बढ़त मिली.
इससे कांग्रेस-राजद को उम्मीद है कि विधानसभा चुनाव में भी यह बढ़त वोटों में तब्दील की जा सकती है लेकिन विधानसभा स्तर पर समीकरण अलग होते हैं. यहां उम्मीदवार की स्थानीय पहचान, जातीय समीकरण और बूथ स्तर पर संगठन की ताकत ज्यादा मायने रखती है. बीजेपी के पास लगातार तीन बार की जीत का अनुभव और संगठन की पकड़ है. वहीं, जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में AIMIM इस सीट से मजबूत उम्मीदवार उतार सकती है और मुसलमानों को एकजुट कर इतिहास रच सकती है.
मुस्लिम नेतृत्व का संकट
प्राणपुर की राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व का अभाव साफ दिखता है. पिछले चार दशक में कोई मुस्लिम चेहरा यहां लगातार चुनाव जीतकर अपनी पकड़ नहीं बना सका. 1980 और 1985 में कांग्रेस से मुस्लिम उम्मीदवार जीते, लेकिन उसके बाद से यह सिलसिला थम गया. कांग्रेस और आरजेडी समय-समय पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारते हैं, लेकिन जातीय समीकरण और वोटों के ध्रुवीकरण के कारण हार का सामना करना पड़ता है. दूसरी तरफ बीजेपी ने यादव और कुशवाहा जैसे जातीय आधार वाले उम्मीदवारों पर भरोसा किया और कई बार सफलता पाई.
साल 2025 के चुनाव में क्या होगा
प्राणपुर विधानसभा चुनाव 2025 बेहद दिलचस्प और कांटे का मुकाबला होने वाला है. यहां कांग्रेस-राजद गठबंधन 2024 की लोकसभा जीत से उत्साहित है और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट रखने की कोशिश करेगा. बीजेपी अपनी मजबूत सांगठनिक पकड़ पारंपरिक वोट बैंक और मुस्लिम वोटों के बिखराव के भरोसे मैदान में है. जदयू अभी भी यादव और कोइरी मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है, जबकि चिराग पासवान की पार्टी युवा मतदाताओं को प्रभावित कर दोनों प्रमुख खेमों का समीकरण बिगाड़ सकती है. वहीं, AIMIM उम्मीदवार उतारकर सबको चौंका सकती है और ध्रुवीकरण में अहम साबित हो सकती है.