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Raghopur Assembly Election 2025: बिहार में इस साल के आखिर में असेंबली इलेक्शन होने हैं. इससे पहले ही लोग अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में कौन सी पार्टी जीतेगी, इसका गणित लगाने में लगे हैं. लोग यह जानने के लिए बेहद उत्सुक हैं कि किस विधानसभा सीट पर किस पार्टी का उम्मीदवार जीतेगा. ऐसे में आज हम आपको बिहार की सबसे चर्चित और राज्य की राजनीति में सबसे अहम राघोपुर विधानसभा सीट के बारे में बताने जा रहे हैं, जो काफी अहमियत रखती है. आज हम इसी सीट के बारे में बताने जा रहे हैं. आइए जानते हैं
साल 1995 से पहले तक यह क्षेत्र वैशाली जिले के नक्शे पर एक साधारण ग्रामीण इलाका भर था, लेकिन लालू प्रसाद यादव के यहां से इलेक्शन लड़ने के बाद यह सीट सीधे सत्ता के केंद्र से जुड़ गई. इसी सीट से लालू यादव मुख्यमंत्री बने, राबड़ी देवी ने सत्ता संभाली और तेजस्वी यादव ने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस विधानसभा क्षेत्र ने बिहार को दो सीएम और एक उपमुख्यमंत्री दिया, वहां मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव बेहद सीमित है. यही वजह है कि राघोपुर की राजनीति में यादव और दलित वोटों की गोलबंदी सबसे अहम कारक बनती रही है, जबकि मुस्लिम वोटर्स सिर्फ “सहायक भूमिका” में ही दिखे हैं.
मुसलमानों की संख्या सीमित
राघोपुर में यादव वोटर्स की संख्या करीब 31 फीसद है. यह सीट की निर्णायक ताकत है और यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव ने सोनपुर छोड़कर 1995 में राघोपुर से किस्मत आजमाने का फैसला किया. यादवों के अलावा यहां 18.56 फीसद अनुसूचित जाति और सिर्फ 3.3 फीसद ही मुस्लिम वोटर्स हैं. राज्य के जिन इलाकों में मुस्लिम वोट निर्णायक साबित होते हैं, वहां वे उम्मीदवार और दलों के लिए किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं लेकिन राघोपुर में यह स्थिति कभी नहीं बनी. यहां मुस्लिम आबादी इतनी कम है कि उनका वोट बैंक अकेले किसी परिणाम को पलटने की स्थिति में नहीं होता. वे हमेशा यादव और दलित वोटों के साथ मिलकर लालू परिवार को मजबूती देते रहे हैं.
राबड़ी देवी का करना पड़ा हार का सामना
अब तक राघोपुर ने ज्यादातर मौकों पर लालू परिवार के प्रति वफादारी दिखाई है. सिर्फ 2010 का इलेक्शन ऐसा रहा, जब जेडीयू के सतीश कुमार यादव ने राबड़ी देवी को हरा दिया था. उस हार ने साफ कर दिया कि यादव वोटों की एकजुटता में अगर सेंध लग जाए तो नतीजे बदल सकते हैं. बीजेपी अब इसी फॉर्मूले पर काम कर रही है.
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि पार्टी 2025 में राघोपुर सीट पर दावा करेगी. नित्यानंद राय खुद यादव समुदाय से आते हैं और वैशाली जिले के ही निवासी हैं. बीजेपी की कोशिश होगी कि यादवों का एक हिस्सा तेजस्वी यादव से नाराज होकर उनके पक्ष में आ जाए और साथ ही राजपूत (40,000), पासवान (18,000) और ब्राह्मण-बनिया जैसे छोटे लेकिन प्रभावी समूहों का समर्थन मिले. इस पूरे समीकरण में मुस्लिम वोटरों का महत्व सीमित ही रहेगा, क्योंकि उनकी संख्या निर्णायक नहीं है. हालांकि, अगर वे पूर्ण रूप से लालू परिवार से दूर चले जाएं, तो यह विपक्षी दलों को अतिरिक्त बढ़त जरूर दे सकता है.
मुस्लिम राजनीति का हाशिया
राघोपुर की राजनीति से एक अहम तथ्य यह निकलता है कि बिहार में मुस्लिम राजनीति हर जगह समान रूप से असरदार नहीं है. सीमांचल जैसे इलाकों में उनकी आबादी 30-40 फीसद तक पहुंच जाती है और वहां वे सीट का रुख तय करते हैं. लेकिन राघोपुर जैसे यादव-बहुल इलाकों में उनकी भूमिका सिर्फ सहयोगी होती है. यही वजह है कि यहां से चुने गए मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री ने कभी भी मुस्लिम मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीति नहीं की. लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम-यादव समीकरण (M-Y) की राजनीति का नारा जरूर दिया, लेकिन राघोपुर में उनकी जीत केवल यादव वोटों की बदौलत सुरक्षित रही. मुस्लिम वोट केवल “सुरक्षा कवच” की तरह जुड़ते रहे.