जानिए इंदौर के 'कामिल' ने राहत इंदौरी बनकर शायरी की दुनिया पर कैसे किया राज

राहत इंदौरी की यौमे पैदाईश 1 जनवरी 1950 को हुई थी. उनका बचपन का नाम कामिल था जो बाद में राहतउल्ला कुरैशी हुआ लेकिन दुनिया में पहचान डॉ. राहत इंदौरी के नाम मिली.

जानिए इंदौर के 'कामिल' ने राहत इंदौरी बनकर शायरी की दुनिया पर कैसे किया राज
फाइल फोटो.

नई दिल्ली: मशहूर शायर राहत इंदौरी का आज दिल का दौरा पड़ने से इंतेकाल हो गया है. मंगल की सुबह उन्होंने ट्वीट करके जानकारी दी थी कि उनकी रिपोर्ट कोरना पॉज़िटिव आई है. राहत इंदौरी अपने बेबाक अदांज़ और बेहतरीन शायरी के लिए पूरी दुनिया जाने जाते रहे हैं. वो हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी अदबी दुनिया के लिए एक मिसाल रहे हैं. राहत इंदौरी की मौत अदबी दुनिया के लिए कभी न भरने वाला ज़ख्म साबित होगा. तो आइए उनके यौमे विलादत पर उनकी ज़िंदगी के कुछ अहम पहलुओं पर नज़र डालते हैं. 

राहत इंदौरी की यौमे पैदाईश 1 जनवरी 1950 को हुई थी. उनका बचपन का नाम कामिल था जो बाद में राहतउल्ला कुरैशी हुआ लेकिन दुनिया में पहचान डॉ. राहत इंदौरी के नाम मिली. उनके वालिद का नाम रफ्तुल्लाह कुरैशी था जो एक कपड़ा मिल में काम करते थे  और उनकी मां का नाम मकबूल-उन-निसा बेगम था. राहत इंदौरी अपने मां-बाप की चौथी औलाद थे. उनकी इब्तेदाई तालीम नूतन स्कूल इंदौर में हुई था. उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी ग्रेजुएट की पढ़ाई मुकम्मल की और 1975 में बरकतउल्लाह यूनिवर्सिटी भोपाल से उर्दू लिट्रेचर में एमए किया. उसके बाद 1985 में मध्य प्रदेश की मध्य प्रदेश भोज मुक्त यूनिवर्सिटी से उर्दू लिट्रेचर में पीएचडी की डिग्री हासिल की थी. 

राहत इंदौरी ने शुरुआती दौर में इंद्रकुमार कॉलेज, इंदौर में उर्दू लिट्रेचर पढ़ाना शुरू किया. फिर बीच में वो मुशायरों में मसरूफ हो गए और पूरे हिंदुस्तान समेत बौरूने मुल्क से दावत मिलनी शुरू हो गई. उनके पास बेमिसाल काबिलियत, सख्त लगन और लफ्ज़ों की जादूगरी थी. जिसकी बदौलत वे बहुत जल्दी व बहुत अच्छी तरह से अवाम के दरमियान मकबूल हो गए. वो इतने मकबूल हो गए कि उन्होंने कई फिल्मों के लिए गीत भी लिखे हैं. 

राहत इंदौरी ने सियासत और मोहब्बत दोनों पर बराबर हक और रवानी के साथ शेर कहे. राहत मुशायरों में एक खास अंदाज़ में ग़म-ए-जाना (प्रेमिका के लिए) के शेर कहने के लिए जाने जाते हैं. मगर उनका उर्दू में मुताले पर किया गया काम उर्दू अदब के लिए विरासत है. 

शुरुआत में इंदौरी पेंटर हुआ करते थे. मालवा मिल इलाके में साइन बोर्ड बनाया करते और कुछ-कुछ लिख कर यार-दोस्तों में सुनाते रहते. पहली बार उन्होंने रानीपुरा में मुशायरा पढ़ा था. यहां स्थित बज्म-ए-अदब लाइब्रेरी में अक्सर मुशायरे की महफिल सजा करती, राहत भी पहुंच जाते थे. एक तरफ बैठ सुनते-गुनते रहते थे. एक दिन वहां मौजूद एक शायर की नजर उन पर पड़ गई.

राहतउल्ला कुरैशी को मंच पर बुला लिया और कहा कि आज तुम्हें मुशायरा पढ़ना है, बस फिर क्या था उन्होंने वो शेर सुनाए कि लोग उनके कायल हो गए. रानीपुरा-मालवा मिल से बढ़ते-बढ़ते पूरा शहर, देश, दुनिया उनके चाहनेवालों में शामिल हो गया. शुरुआत में वे रानीपुरा में एक दुकान पर बैठा करते थे, तब ही मकबूल हो गए थे.

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