Ramadan 2026: रमजान के पाक महीने में मुसलमान इबादत में मशगूल हैं. रमजान का पहला अशरा चल रहा है और इस दौरान लोग कई बातों को लेकर भ्रम की स्थिति में रहते हैं. जैसे रमजान के दौरान किन इबादत को फर्ज, वाजिब, सुन्नत, और नफ्ल कहा गया है. मुबाह, मकरूह और हराम क्या होता है? रमजान में इससे कैसे बचना है? JMI के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर खालिद मुबश्शिर ने इनपर इस्लामी फिक्ह का हवाला देते हुए विस्तार से चर्चा की है. आइये समझते हैं?
Trending Photos
)
रमजान के पाक महीने में पूरी दुनिया के मुसलमान इबादत में मशगूल हैं. रमजान में नमाज पढ़ते हुए, रोजा रखते हुए या सदका देते हुए अक्सर यह सवाल उठता है कि कौन-सा अमल फर्ज है, कौन सुन्नत और कौन सिर्फ नफ्ल है? रमजान और दूसरे महीनों में आम मुसलमान इबादत तो करता है, लेकिन अमल की किस्मों को लेकर भ्रम बना रहता है. यही वजह है कि कई बार नफ्ल को फर्ज जैसा समझ लिया जाता है, और कभी फर्ज को हल्का समझकर छोड़ दिया जाता है. इस्लामी फ़िक़्ह इन तमाम उलझनों का जवाब बेहद साफ उसूलों के साथ देता है.
इस्लाम में इंसान के हर काम चाहे वह इबादत हो या रोज़मर्रा की जिंदगी, को तय दायरों में रखा गया है. इन दायरों को 'अहकाम-ए-शरई' कहा जाता है. कुरआन, हदीस और सदियों की फिकह मेहनत के आधार पर उलेमा ने अमल को अलग-अलग दर्जों में बांटा है, ताकि मुसलमान यह समझ सके कि क्या सबसे जरूरी है और किसका दर्जा उसके बाद आता है. अब बात करते हैं, इस्लाम में श्रेणीवार उन अमल के बारे में.
फर्ज यानी अल्लाह का सबसे पक्का हुक्म
'फर्ज' इस्लाम का सबसे ऊंचा दर्जा है. यह वह अमल है जिसका हुक्म कुरआन या पुख्ता और लगातार चली आ रही हदीस से साबित होता है. फर्ज का पालन करना हर मुसलमान पर अनिवार्य कर दिया गया है. इसे जानबूझकर छोड़ना सख्त गुनाह है, जबकि इसका इनकार करना ईमान से बाहर कर देता है. रोजाना पांच वक्त की नमाज, रमजान के रोजे और साहिब-ए-निसाब पर जकात इसी दर्जे में आती हैं. अगर किसी के पास पैसा है तो उसे अपनी ज़िन्दगी में एक बार हज भी करना है. हर मुसलमान पर इल्म हासिल करना भी फ़र्ज़ है, चाहे वो मरद हो या औरत हो. ज्ञान ही उसे अल्लाह की पहचान कराता है. सही और गलत में भेद करना सिखाता है. सच्चा रास्ता बताता है. लेकिन बहुत से मुस्लमान इस फ़र्ज़ को छोड़ देते हैं.
यह भी पढ़ें: दफ्तर में नमाज या पूजा कितना सही? संविधान-कोर्ट ने खींच दी अकीदे और अनुशासन की लकीर
वाजिब: फर्ज के करीब का दर्जा
'फर्ज' के बाद 'वाजिब' का दर्जा आता है, जिसे खास तौर पर हनफी फिक्ह में अलग पहचान दी गई है. वाजिब वह अमल है जिसे करना जरूरी है और जान-बूझकर छोड़ने पर गुनाह होता है, लेकिन इसका इनकार कुफ़् नहीं बनता. जैसे वित्र की नमाज, ईद की नमाज और कुर्बानी को वाजिब कहा गया है. फर्ज और वाजिब का फर्क मामूली नहीं, बल्कि फिक्ही उसूलों पर आधारित है.
क्या है सुन्नत?
अब बात करते हैं, सुन्नत की. यह दो तरह का होता है. सुन्नत मुअक्कदा वे अमल हैं जिन्हें पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लगातार अपनाया और बिना वजह छोड़ा नहीं. इनका दर्जा फर्ज और वाजिब से नीचे है, लेकिन इन्हें हल्के में लेना भी सही नहीं है. बिना वजह इन्हें छोड़ना बुरा माना गया है और अगर कोई इन्हें आदत बना ले तो उलेमा के नजदीक यह गुनाह के करीब है. फज्र की नामज़ की दो सुन्नतें इसका बड़ा उदाहरण हैं. निकाह करना इसी तरह के सुन्नत में शामिल है.
इसके बाद सुन्नत गैर मुअक्कदा का दर्जा आता है. ये वे अमल हैं जिन्हें नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी किया और कभी छोड़ा भी. इन्हें करने पर सवाब मिलता है, लेकिन छोड़ने पर कोई गुनाह नहीं होता. असर की नमाज़ से पहले चार रकअत नमाज इसी श्रेणी में रखी जाती है. मुसलमानों का दाढ़ी रखना, टोपी पहनना आदि भी सुन्नत अमल है. इसी तरह खतना कराना भी सुन्नत इब्राहिमी है. सुन्नत इब्राहिमी का मतलब ये है, जो चीज़ें हजरत इब्राहिम के सीख से मिली हैं. यही वजह है कि यहूदी और इसाई भी खतना कराते हैं, क्यूंकि ये दोनों मजहब के लोग इब्राहिम को अपना पैगम्बर मानते हैं. उमरा पर जाना भी सुन्नत अमल है.
नफ्ल या मुस्तहब: इख्तियार की इबादत
नफ्ल या मुस्तहब वह अमल है जिसे इंसान अपनी मर्जी से अल्लाह की कुर्बत हासिल करने के लिए करता है. इन्हें करने पर सवाब है, लेकिन न करने पर कोई पकड़ या गुनाह नहीं है. तहज्जुद, इशराक और चाश्त जैसी नमाजें नफ्ल में शामिल हैं. फिक्ह साफ तौर पर बताती है कि नफ्ल इबादत फर्ज की भरपाई नहीं बन सकती. जुमे के दिन नमाज़ से पहले नहाना मुस्तहब है.
मुबाह, मकरूह और हराम में क्या है अंतर?
'मुबाह' वे काम हैं जिनकी इजाजत इस्लाम ने दी है. इन्हें करने या न करने पर न सवाब है, न गुनाह है. हलाल खाना, कारोबार करना या आम सफर करना इसी में आता है. यह दर्जा इस्लाम के संतुलन को दिखाता है. 'मुबाह' के मायने हैं जायज या जिसकी इजाजत दी गई हो. जैसे कोई व्यक्ति रोज़े की हालत में अपनी पत्नी से प्रेम कर सकता है, लेकिन लेकिन हमबिस्तर करने से रोजा टूट जाता है, और उसका काफ्फारा भी अदा करना होता है.
इसी तरह 'मकरूह' वे काम हैं जिन्हें पसंद नहीं किया गया है. कुछ मकरूह तहरीमी होते हैं, जो गुनाह के क़रीब हैं, जबकि कुछ मकरूह तनजीही होते हैं, जिन्हें छोड़ना बेहतर है. जैसे झींगा मछली या घोंघा खाना मकरूह है लेकिन गुनाह नहीं, इसी तरह तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट आदि का सेवन मकरूह तनजीही है, जिसे एक तरह से गुनाह माना गया है. इसके उलट हराम वह अमल है जिसे सख्ती से मना किया गया है. हराम को करना बड़ा गुनाह है और उसे हलाल समझना कुफ्र माना गया है. जैसे शराब पीना, ज़ना करना, हराम का माल खाना या कमाना, चोरी करना, झूठ बोला, चुगली करना आदि.
इस्लामिक मामलों के जानकार और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर खालिद मुबश्शिर कहते हैं कि "फर्ज से हराम तक की यह पूरी तसीम उलेमा की व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि बहिश्ती जेवर, तालीमुल इस्लाम, नूरुल इजाह और फतावा आलमगीरी जैसी क्लासिकल फिक्ही किताबों में दर्ज है." उन्होंने आगे कहा कि "इस्लाम का पैगाम साफ है, हर अमल का अपना दर्जा है. न तो फर्ज को नफ्ल समझकर छोड़ा जा सकता है और न नफ्ल को फर्ज बनाकर दूसरों पर थोपा जा सकता है. सही समझ ही सही अमल की राह दिखाती है."
यह भी पढ़ें: Ramadan के तीन अशरे क्या हैं? रहमत से निजात तक की पूरी रूहानी सफर समझिए