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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा राज्य अल्पसंख्यक आयोग का पुनर्गठन कर रूमाना सिद्दीकी को तीसरी बार सदस्य नियुक्त किया जाना राज्य के अल्पसंख्यक समाज, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक स्वागत योग्य और सराहनीय कदम है. लखनऊ की वरिष्ठ समाजसेवी और प्रखर राजनेता रूमाना सिद्दीकी की इस पद पर वापसी न सिर्फ उनके पिछले कार्यकाल के बेहतरीन काम की तस्दीक करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को पार्टी में सही वक़्त पर उचित सम्मान भी मिलता है.
अनुभव और सेवाभाव को मिला सम्मान तीसरी बार
रूमाना सिद्दीकी कोई नया नाम नहीं है, इससे पहले साल 2021 में भी जब उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य अल्पसंख्यक आयोग का सदस्य बनाया गया था, तब उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अल्पसंख्यकों से जुड़े कई जटिल मुद्दों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. चाहे वह मुस्लिम महिलाओं के हक और अधिकारों की बात हो, या अल्पसंख्यक समाज के युवाओं को सरकारी योजनाओं और रोजगार से जोड़ने का प्रयास. रूमाना सिद्दीकी हमेशा अग्रिम पंक्ति में खड़ी दिखाई दी हैं. कहा जा रहा है कि उनके इसी बेदाग ट्रैक रिकॉर्ड, प्रशासनिक समझ और समाज के प्रति अटूट निष्ठा को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें दोबारा इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए चुना है.
तीन साल का कार्यकाल
इस नवनियुक्त आयोग का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा. पूर्व अध्यक्ष का कार्यकाल ख़त्म होने के बाद से आयोग के पास बड़ी तादाद में शिकायतें लंबित पड़ी थीं. ऐसे समय में जब अल्पसंख्यक समाज को एक संवेदनशील और सक्रिय नेतृत्व की ज़रूरत थी, रूमाना सिद्दीकी की नियुक्ति एक बड़ी राहत बनकर आई है. अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं के बीच उनकी गहरी पैठ है. उनका मानना रहा है कि जब तक समाज की आधी आबादी (महिलाएं) शिक्षित और आत्मनिर्भर नहीं होगी, तब तक अल्पसंख्यक समुदाय का संपूर्ण विकास संभव नहीं है. उम्मीद जताई जा रही है कि अपने इस कार्यकाल में वे विशेष रूप से लड़कियों की उच्च शिक्षा और महिला उद्यमिता (महिला स्टार्टअप) को बढ़ावा देने के लिए बड़े कदम उठाएंगी.
समाज और सरकार के बीच मजबूत सेतु
राजनैतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि रूमाना सिद्दीकी जैसे ऊर्जावान चेहरों को आयोग में शामिल करने से सरकार और जनता के बीच की दूरी कम होगी. वे एक ऐसी संवेदनशील महिला हैं, जो केवल दफ्तरों में बैठकर फैसले लेने के बजाय जमीनी स्तर पर जाकर लोगों की समस्याओं को सुनती हैं. उनकी इस नियुक्ति से न सिर्फ लखनऊ बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक समाज में एक सकारात्मक संदेश गया है. अब उम्मीद है कि उनके मार्गदर्शन में आयोग पूरी पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ न्याय के पहिये को तेजी से आगे बढ़ाएगा.