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Prohphet Muhammad Hijrat: सऊदी अरब में एक अनोखी और ऐतिहासिक पहल की शुरुआत होने जा रही है, जिसका नाम है 'इन द प्रोफेट्स स्टेप्स' यह एक सकाफती और रूहानी प्रोजेक्ट है, जिसका मकसद लोगों को पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के मक्का से मदीना तक के हिजरत के सफर का लाइव एक्सपीरियंस कराना है. इस खास सफर का आयोजन जनरल एंटरटेनमेंट अथॉरिटी (GEA) की निगरानी में किया जा रहा है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सफर की शुरुआत नवंबर में होने वाली है, लेकिन लोगों में इसको लेकर इतना उत्साह है कि अभी तक 10 लाख से ज्यादा लोगों ने रजिस्ट्रेशन करा लिया है. ये 450 KM लंबा सफर है. आज हम आपको प्रोफेट मोहम्मद (स.अ) के इस रुहानी सफर की पूरी जानकारी देने वाले हैं और बताएंगे कि उन्हें आखिर ये सफर क्यों करना पड़ा और इस दौरान उन्होंने कहां-कहां कयाम किया और उनके सामने क्या मुश्किलात सामने आईं?
जब मक्का में इस्लाम फैलना शुरू हुआ तो ये बात कुरैश कबीले (पैगम्बर का विरोधी कबीला) के काफी लोगों को पसंद नहीं आई और वे पैगंबर मोहम्मद (स.अ) और उनके साथियों के दुश्मन हो गए. ऐसे में आप ने फैसला किया कि साथियों को मदीना की तरफ रवाना कर दिया जाए और खुद फौरी तौर पर मक्का में ही कयाम किया जाए, जब तक अल्लाह की तरफ से उनके हिजरत (पलायन) का हुक्म नहीं होता.
लेकिन, मक्का के लोग किसी तरह पैगंबर मोहम्मद (स.अ) को कत्ल करना चाहते थे, इस बात की आप को भनक लग गई. इससे पहले ही खुदा का हुक्म हो गया था कि आप को मक्का छोड़कर मदीना जाना है. एक रात अबू जहल की राय के बाद पैगंबर मोहम्मद (स.अ) को घेर लिया. लेकिन, अरब में रिवाज था कि जनाना घर में कोई बिना इजाजत नही घुसता था. सभी आपका इंतेजार बाहर रहकर करने लगे. आप ने पहले ही अपने बिस्तर पर हजरत अली को सुलाया हुआ था. सुबह हुई तो अली उठे और सभी हत्यारे देख कर हक्के बक्के रह गए. शोर मच गया कि मोहम्मद (स.अ) मदीना के लिए निकल चुके हैं.
पैगंबर मोहम्मद (स.अ) रात में ही अपने साथी अबू बकर के साथ मदीना के लिए रवाना हो गए थे. इस हिजरत के लिए उन्होंने खास प्लान बनाया. उन्हें पता था कि जो कोई भी उनका पीछा करेगा वह उत्तर की तरफ मदीना जाएगा. इसलिए उन्होंने दक्षिण में सौर की पहाड़ी पर जाने का फैसला किया. जहां उन्होंने एक गुफा में कुछ दिन ठहरने का प्लान बनाया.
लेकिन, मक्का के लोगों को इस बारे में भनक लग गई और उन्होंने पैगंबर मोहम्मद (स.अ) का पीछा किया और सौर पहाड़ी पर गुफा तक जा पहुंचे. उस वक्त पैगंबर नमाज पढ़ रहे थे. जैसे ही नमाज पूरी हुई अबू बकर सिद्दीक ने कहा कि मक्का के लोग आ गए हैं. लेकिन पैगंबर (स.अ) को यकीन था कि अल्लाह उनके साथ है और उन्हें कुछ नहीं होगा.

गुफा की तरफ जब मक्का के दुश्मन बढ़े तो उन्होंने देखा कि वहां कबूतर ने अंडे दिए हुए हैं और मकड़ी ने जाला बनाया हुआ है. इससे उन्हें लगा कि इस गुफा में कोई दाखिल नहीं हुआ है. इसे देख वह काफी बैचेन और निराश हो गए और अपना सिर पीटने लगे कि आखिर मोहम्मद (स.अ) कहां गए? इसके बाद वह वहां से वापस माक्का लौट आए.
इस गुफा में पैगंबर मोहम्मद तीन दिन तक ठहरे रहे और इस दौरान अबू बकर के बेटे मक्का में अब्दुल्लाह कुरैश का प्लान पता करते और शाम में इस गुफा में आकर नबी और अपने वालिद को बताते. उनके साथ अबू बकर की बेटी असमा भी खाना लेकर आतीं. उनका गुलाम आमिर बिन फुहैरा बकरियां लेकर आता और वे उनका दूध पी लेते. इसके बाद तीनों वापस लौट जाते. पीछे उनका गुलाम बकरियां लेकर चलता ताकि पैरों के निशान मिट सके.
तीन दिन बाद अबू बक्र, पैगंबर मोहम्मद और एक साथी मदीना के लिए रवाना हो गए. अबू जहल और उसके साथियों ने पैगंबर मोहम्मद को पकड़ने वाले को 100 ऊंट इनाम में देने का वादा किया हुआ था. दुश्मनों के बीच सुराका नाम का शख्स था उसे पैगंबर मोहम्मद के बारे में खबर मिली, जो गुफा से निकलकर मदीने की तरफ रवाना हुए थे. आप एक दिन और एक रात अपनी ऊटनियों पर लगातार चलते रहे, और अगले दिन एक चट्टान के पास साये में आराम करने के लिए रुके.
इतने ही देर में सुराका अपने घोड़े से तेजी से उनकी और बढ़ता हुआ दिखा. सुराका मक्का से जब निकला था तो उसका घोड़ा कई बार ठोकर खाकर गिरा था और अब फिर पैगंबर मोहम्मद के पास पहुंचने से पहले कुछ ऐसा ही हुआ. तेजी से भागता हुआ घोड़ा अचानक से गिर गया और सुराका का मुंह जमीन में जा लगा. अब उसे यकीन हो गया कि इसमें अल्लाह की मरजी नहीं है.
ये देखते हुए सुराका ने मोहम्मद (स.अ) से बात करने का फैसला किया और कहा वह अम्न की तहरीर चाहता है. इस पर अबू बक्र ने एक चमड़े पर उसे लिख कर दे दिया. सुराका वापस लौट आया और उसने कुरैश को इसके बारे में कुछ नहीं बताया. वह इस दौरान आप (स.अ) का इतना कायल हो गया कि अगर कोई उन पर हमले का प्लान बनाता तो वह उसे अपनी बातों से रफा-दफा कर देते.
पैगंबर मोहम्मद ने अपना मदीना का सफर जारी रखा और वह चलते रहे. मदीना से तीन दिन पहले उन्होंने आलीया और कुबा नाम की जगह पर कयाम (अस्थाई ठहराव) किया. यहां मुसलमानों के ऊंचे घराने के लोग रहा करते थे. इस जगह वह 14 दिन रुके. इसी जगह उनकी मुलाकात हजरत अली से हुई जो मक्का से आप से मुलाकात के लिए रवाना हुए थे और बिना कुछ खाए पिए लगातार चल रहे थे, और उनके पैर भी जख्मी हो चुके थे.
यह जुमा का दिन था, बनी सालिम के मुहल्ले में आप ने जुमा की नमाज पढ़ी, और एक खजूर के पेड़ के नीचे अपने साथियों से मुलाकात की और मदीना में दाखिल हो गए. जहां उनका इंतेजार मुसलमानों के साथ-साथ यहूदी भी कर रहे थे. पैगंबर को ऊंट से आते देख सब खुशी से पागल हो गए और गाने लगे. अब सवाल था कि आप किसके घर पर रुकेंगे. आप (स.अ) ने कहा कि जहां ये ऊटनी जहाँ जाकर रुकेगी मैं वही कयाम करूंगा. एक जमीन के पास जाकर उनकी ऊटनी बैठ गई.

आप ने पूछा कि ये जमीन किसकी है तो अफरा के बेटे मुआज आगे बढ़े और कहा सुहैल और सहल दो यतीम बच्चों की है. दोनों यतीमों ने अपनी जमीन मुफ्त में देने की बात कही, लेकिन आप को ये पसंद नहीं था, तो इस जमीन की रकम देकर खरीद लिया और फिर यहां एक मस्जिद बनाई गई. रात में आप बनी नज्जर कबीले में ठहरे. इस तरह पैगंबर मोहम्मद मक्का से मदीने पहुंचा थे.. हालांकि, इतिहास या कुरआन में इस बात का जिक्र नहीं मिलता है कि ये यात्रा कितने दिनों में तय हुई थी. लेकिन सऊदी अरब सरकार अब धार्मिक पर्यटन के तौर पर इस यात्रा का फील देने के लिए आम लोगों को 'इन द प्रोफेट्स स्टेप्स' के सफ़र पर लेकर जायेगी.