Shab-E-Barat 2026: असम के अल्हिलाल कमिटी समेत कई मुस्लिम इदारों ने इस बात का ऐलान किया है कि साल 2026 के शाबान माह की 15वीं तारीख को पड़ने वाली शबे-बरात 3 फरवरी को होगी. इसके ठीक 15 दिन बाद चाँद के मुताबिक 17 या 18 फरवरी से रमजान का महीना भू शुरू हो सकता है.
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नई दिल्ली: अभी रमजान के ठीक पहले वाला शाबान का अरबी महीना चल रहा है. साल 2026 का शबान का महीना पिछले 20 जनवरी,से शुरू हुआ है, अगले माह चाँद के मुताबिक 18 फरवरी, तक रह सकता है.इसी माह के बीच में यानी 15 दिन पर शब-ए- बरात मनाई जाती है. इस बार शब-ए- बरात तीन फरवरी को पड़ रहा है, इसी दिन इसे मनाया जाएगा.
असम के केंद्रीय हिलाल कमेटी के सद्र मौलाना शेख फखरुद्दीन कासमी ने सार्वजनिक तौर पर बुधवार को ऐलान कर कहा है कि फरवरी महीने के 3 तारीख को शबे बरात मनाई जाएगी. कमेटी के नायब सद्र मुफ्ती जहरूद्दीन ने भी इसे तस्दीक करते हुए कह कि आने वाले तीन तारीख को असम और नॉर्थ ईस्ट में शब बरात मनाई जाएगी. मगरिब की नमाज़ के बाद गुवाहाटी और नॉर्थ ईस्ट के मस्जिदों में सामूहिक शबे बरात की नमाज अदा की जायेगी. इसके बाद हो सकता है कि 17 या 18 फरवरी से रमजान का महीना भी शुरू हो सकता है.
क्या है शब-ए- बरात की अहमियत और फजीलत
इस्लाम के मुताबिक साल के सबसे पाक महीने रमज़ान से ठीक पहले आने वाला शाबान का माह एक तरह से रमज़ान की तैयारियों के लिए जाना जाता है, लेकिन इस माह की अपनी अलग अहमियत है. तिर्मिज़ी की एक रवायत के मुताबिक, अबू बक्र अल-वर्रक़ अल-बल्खी (र.अ.) ने कहा- "रजब का महीना बीज बोने का महीना है, शाबान की सिंचाई का महीना है और रमज़ान की महीना फसल काटने का महीना है." एक हदीस के मुताबिक पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) रमज़ान के अलावा किसी भी अन्य महीने की तुलना में शाबान में सबसे ज्यादा रोज़ा रखते थे.
इस महीने में लोग नफिल रोज़े रखते हैं, कुरआन की तिलावात करते हैं और दान देते हैं. खुद के लिए और अपने पूर्वजों के लिए कसरत से दुआ मांगते हैं. वहीँ, शाबान की 15वीं तारीख को लोग जागकर नफिल नमाज़ पढ़ते हैं, कुरआन की तिलावत करते हैं. कब्रिस्तान जाकर अपने पूर्वजों के लिए दुआ करते हैं. कुछ लोग कब्रिस्तानों में दीये, मोमबत्ती और अगरबत्ती आदि जलाते हैं. इस दिन कुछ लोग मस्जिदों और मोहल्ले को भी सजाते हैं, और आतिशबाजी भी करते हैं. लेकिन इस दिन होने वाले इन कामों को लेकर मुसलमानों के विभिन्न समूहों के बीच आपस में विरोध है.
भारत और पाकिस्तान के बरेलवी मसलक के मुसलमान, ये भी मानते हैं कि इस रात को अल्लाह के फ़रिश्ते लोगों के सालभर के पाप- और पुण्य का हिसाब-किताब करते हैं, इसलिए लोग रात-रातभर जागकर इबादत करते हैं. कुछ लोगों की ये भी मान्यता है कि इस दिन पूर्वजों की रूह अपने अपने घर वापस आती है. इसलिए लोग उस दिन हलवा- खीर और अच्छा खाना बनाकर उसपर फातिहा पढ़कर उसे गरीबों में दान करते हैं, ताकि इसका सवाब उनके पूर्वजों तक पहुँच सके.
हालांकि, देवबंदी या बहाबी मसलक के मुसलमान इस रात को पाप- पुण्य का लेखा-जोखा होने या फिर पूर्वजों के रूह के घर लौटने की मान्यता को खारिज करते हैं. मुफ़्ती अब्दुर्रहीम कासमी कहते हैं, कुरान और हदीस में इस रात के बारे में कोई जिक्र नहीं है. कुरान में सिर्फ रमजान के आखिरी दस दिनों में 5 रातों में किसी एक रात को 'लैलतुल कद्र' यानी हज़ार रातों से बेहतर एक रात का जिक्र है, जिसमें इबादत करने का सवाब बहुत ज्यादा है.
हालांकि, इस बात पर सभी मुसलमानों की आम राय है कि ये माह एक तरह से रमजान के महीने में इबादत करने की तैयारी का माह है. इस माह से ही लोग इबादत में मशगूल होने लगते हैं.
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