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Zee SalaamZee Salaam ख़बरेंसोशल मीडिया और मुसलमान: लाइक और शेयर के लिए झूठ और प्रोपगैंडा से रहें दूर

सोशल मीडिया और मुसलमान: लाइक और शेयर के लिए झूठ और प्रोपगैंडा से रहें दूर

Social media and Muslims: सोशल मीडिया अब आम इंसानों की ज़िन्दगी का ज़रूरी हिस्सा बन चुका है. मुसलमानों की एक बड़ी आबादी इस प्लेटफार्म से जुड़ी है, ऐसे में उन्हें जानना ज़रूरी हो जाता है कि हदीस और कुरआन इस बात की ताकीद करता है कि किसी खबर को तस्दीक किये बिना दूसरे से साझा करना, उसपर भरोसा करना और किसी की बुराई या कमियों को उछालना कितना बड़ा गुनाह है? मुस्लिम स्कॉलर मुहम्मद उस्मान एडवोकेट अज़हरी कुरान की रोशनी में बता रहे हैं सोशल मीडिया इस्तेमाल के एथिक्स. 

सोशल मीडिया और मुसलमान: लाइक और शेयर के लिए झूठ और प्रोपगैंडा से रहें दूर

ज का दौर सिर्फ सूचनाओं का नहीं, बल्कि प्रभाव का दौर है. एक क्लिक, एक कमेंट और एक फ़ॉरवर्ड, ये सब सिर्फ़ डिजिटल इंवोल्वमेंट नहीं, बल्कि इंसानों की इज़्ज़त, रिश्तों और समाज के माहौल पर असर डालने वाले अमल हैं. ख़ासकर सोशल मीडिया पर सरगर्म नौजवानों के लिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि दीन-ए-इस्लाम सिर्फ इबादतों का नाम नहीं, बल्कि अख़लाक़, ज़िम्मेदारी और इंसाफ़ का मुकम्मल निज़ाम है.

   सबसे पहले बात करते हैं बिना तहक़ीक़ बात फैलाने की. आज सोशल मीडिया पर सबसे बड़ा मसला यही है कि लोग हर सुनी-सुनाई बात को बिना जाँचे आगे बढ़ा देते हैं. Qur'an (49:6 का ख़ुलासा) साफ़ तौर पर हिदायत देता है कि अगर कोई ख़बर आए तो उसकी जांच कर लो, कहीं ऐसा न हो कि नादानी में किसी को नुकसान पहुंचा बैठो. यह आयत हमें सिखाती है कि हर फ़ॉरवर्ड करने से पहले रुकना, सोचना और सत्यापन करना ईमान का हिस्सा है.

    दूसरा अहम पहलू है ग़ीबत और बुराइयों को उजागर करना. किसी की कमी को सार्वजनिक करना आज के दौर में एक 'ट्रेंड' बन गया है, जबकि इस्लाम इसे सख़्ती से मना करता है. Qur'an (49:12 का ख़ुलासा) ग़ीबत को बेहद नापसंद अमल करार देता है. इस्लामी मिज़ाज यह है कि अगर किसी में कोई कमी है, तो उसे ढंका जाए और सही तरीक़े से उसकी इस्लाह की जाए, न कि उसे वायरल कंटेंट बना दिया जाए?

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   तीसरा मुद्दा है बदगुमानी (सू-ए-ज़न). आज के डिजिटल माहौल में लोग अधूरी जानकारी की बुनियाद पर राय बना लेते हैं, और दूसरों की नीयत पर सवाल खड़े कर देते हैं. इस्लाम सिखाता है कि बेबुनियाद शक से बचो, क्योंकि यह इंसाफ़ के खिलाफ़ है और दिलों में नफ़रत पैदा करता है. एक मोमिन का रवैया ये होना चाहिए कि वो दूसरों के बारे में अच्छा गुमान रखे, जब तक कि साफ़ सबूत उसके उलट न हों.

   अब आते हैं हौसला अफ़ज़ाई और हौसला-शिकनी पर, जो लोग समाज में अच्छा काम कर रहे हैं, चाहे वो तालीम हो, ख़िदमत हो या दावत, उनका साथ देना, उनकी तारीफ़ करना इस्लाम की रूह के मुताबिक है. Qur'an (5:2 का ख़ुलासा) भलाई के कामों में एक-दूसरे की मदद करने का हुक्म देता है. इसके विपरीत, तंज करना, मज़ाक उड़ाना और निरुत्साहित करना न सिर्फ़ ग़लत है, बल्कि समाज में सकारात्मकता को ख़त्म करता है.

   इसी सिलसिले में एक और अहम उसूल है, किसी इंसान की 99 कमियों के बजाय उसकी 1 अच्छाई को देखना. इस्लाम इंसाफ़ और संतुलन सिखाता है. हर इंसान में ख़ामियां भी होती हैं और ख़ूबियां भी. समझदारी ये है कि अच्छाई को पहचानकर उसे बढ़ाया जाए और कमियों की इस्लाह की जाए. एक हदीस का मफ़हूम है कि जो किसी की कमियों को छुपाता है, अल्लाह उसकी कमियों को छुपाता है (Sahih Muslim). ये हमें बताता है कि समाज सुधार का तरीक़ा आलोचना नहीं, बल्कि रहम, समझ और मसबत नज़रिया है.

   अब बात उन लोगों की, जो सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और 'फतवा-गैंग' के नाम से जाने जाते हैं. हर बात पर तुरंत फैसला सुनाना, बिना इल्म के धार्मिक हुक्म जारी करना, और दूसरों को नीचा दिखाना, यह न तो दीनदारी है, और न ही अख़लाक़ है. दीन में बात करने के लिए इल्म, हिकमत और जिम्मेदारी की ज़रूरत होती है. बिना समझ के फतवे देना न सिर्फ़ गुमराह करता है, बल्कि दीन की छवि को भी नुकसान पहुंचाता है.

   इस्लाम ऐसे रवैये को सख़्ती से नापसंद करता है, जो लोग इन उसूलों को नज़रअंदाज़ करते हैं, वो न सिर्फ़ गुनाह के करीब जाते हैं, बल्कि समाज में फितना और नफ़रत फैलाने की वजह बनते हैं. आख़िरत में भी उन्हें अपने हर लफ़्ज़ और हर अमल का हिसाब देना होगा.

   आख़िर में, हर नौजवान को ख़ुद से कुछ सवाल पूछने चाहिए:- क्या जो मैं लिख रहा हूं, वो सच है? क्या इससे किसी की इज़्ज़त को ठेस पहुँचेगी? क्या ये अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नज़र में पसंदीदा होगा? अगर इन सवालों का जवाब नहीं में है, तो फिर इस सबसे रुक जाना ही आपके हक़ में बेहतर है.

    नतीजा: सोशल मीडिया एक ताकत है, इसे आप नेकी का जरिया भी बना सकते हैं, और गुनाह का माध्यम भी. इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपने लफ़्ज़ों, अपने रवैये और अपने इरादों को पाक रखें. असली दावत यही है कि हम अपने किरदार से भलाई दिखाएं, न कि दूसरों की बुराइयों को उछालकर ख़ुद को बेहतर साबित करें.

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Muhammad Osman Azhari

मुहम्मद उस्मान अज़हरी पेशे से एक वकील, और प्रसिद्ध मुस्लिम स्कॉलर हैं, जो देश के कानून और संविधान की रोशनी में मुस्लिम समाज के सियासी, समाजी, शैक्षणिक और आर्थिक मसलों के साथ-साथ इस्लाम के बारे में ...और पढ़ें

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