किस्सा आज का : जब नेताजी ने देश के लोगों में फूंकी आजादी की चिंगारी और बन गए सबके चहेते
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किस्सा आज का : जब नेताजी ने देश के लोगों में फूंकी आजादी की चिंगारी और बन गए सबके चहेते

इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि आज ही के दिन 25 अक्टूबर सन 1924 को भारत में ब्रिटिश अधिकारियों ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को गिरफ्तार कर 2 साल के लिए जेल भेज दिया गया था. 

किस्सा आज का : जब नेताजी ने देश के लोगों में फूंकी आजादी की चिंगारी और बन गए सबके चहेते

कुलदीप नागेश्वर पवार/नई दिल्ली: ये बात है उस समय की जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था. गैर-मुल्की आततायियों और ब्रिटिश हुकूमत के घृणित कृत्यों और अपमान के चलते हर भारतीय खुद को हकीर नज़रों से देखने लगा था. लेकिन इन विषम हालात में भी एक बंगाली युवा अपने मन मस्तिष्क में राष्ट्र की आज़ादी की पटकथा रच रहा था. हम बात कर रहे है राष्ट्र के प्रेरणा पुरुष व आज़ाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) की.

नेताजी सुभाष (Subhash Chandra Bose) एक उग्र राष्ट्रवादी थे, जिनकी उद्दंड देशभक्ति ने उन्हें भारतीय तारीख के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक बनाया. उन्होंने अपने अंथक कोशिशों से भारतीय फौज को ब्रिटिश भारतीय सेना से एक अलग इकाई के रूप में स्थापित किया जो जंगे आज़ादी में नींव का पत्थर साबित हुई.

इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि आज ही के दिन 25 अक्टूबर सन 1924 को भारत में ब्रिटिश अधिकारियों ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को गिरफ्तार कर 2 साल के लिए जेल भेज दिया गया था. आइये आज के इस दिन पर हम नेताजी के जीवन से जुड़े कुछ पहलुओं से रूबरू होते है.

अंग्रेजी हुकूमत के वक्त भारतीयों का सिविल सर्विस में जाना लगभग असंभव सी बात थी लेकिन नेताजी ने इस परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया. अपने पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य के चलते सन 1921 में आपने सिविल सर्विस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

सिविल सर्विस छोड़ने के बाद नेताजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जॉइन किया. जहां उन्होंने आजादी को लेकर देश भर के नेताओं से मंत्रणा की. गांधी स्वयं सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) की तर्क शक्ति, निडरता और कुटिलता के कायल हो चुके थे. नेताजी भी गांधी का उतना ही सम्मान करते थे, यहीं कारण था कि उन्होंने सबसे पहले उन्हें राष्ट्रपति कहकर सम्बोधित किया. लेकिन नेताजी बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से कतई भी सहमत नहीं थे. वे हमेशा से बिना शर्त स्वराज (Unqualified Swaraj) के पक्षधर थे और इसी के चलते उन्होंने मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट की भी मुखालिफत की जिसमें भारत के लिए डोमिनियन के दर्जे की बात कही गई थी. असल मायनों में अब तक की अध्ययन सामग्री में प्रकाशित जानकारियों व स्थितियों पर गौर किया जाए तो जान पड़ता है कि कांग्रेस कभी नेताजी के विचारों से सहमत नहीं रही। खास तौर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू जिसका एक प्रमुख कारण स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता था कि एक पल भर के लिए अगर मान भी लिया जाए कि गांधी के दिखाए अहिंसा के रास्ते से भारत को आजादी मिल भी जाती है तो आज़ाद भारत की बागडोर किसके हाथ में दी जाएगी ? क्या गांधी के प्रिय बोस के रहते देश के प्रधानमंत्री के तौर पर जनता किसी दूसरे को स्वीकार करेंगी ? क्या गांधी किसी ओर के नाम पर राजी होंगे ? ये वो प्रश्न थे जो उन दिनों कांग्रेस के नेता बैठकों में या निजी चर्चाओं में अक्सर पंडित नेहरू से करते थे. इन विचारों के अरअक्स नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि बिना खून से सींचे आज़ादी का बीज अंकुरित होना, जागती आँखों से स्वप्न देखने जैसा है. नतीजतन वह कांग्रेस छोड़ कोलकाता वापस आ गए और वहीं चितरंजन दास के साथ स्वराज पार्टी के लिए काम करने लगे.

1924 में वह कोलकाता के चीफ एग्जेक्युटिव ऑफिसर के लिए चुने गए. आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. शुरू में उन्हें अलीपुर जेल में रखा गया बाद में वहां से मांडले जेल भेज दिया गया. जेल से छूटकर आए तो कोलकाता के मेयर चुने गए.

सिविल सर्विस की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद से नेताजी की गिरफ्तारी का सिलसिला चलता ही रहा लेकिन उनकी चालाकियों के चलते बेचारे गोरे हमेशा मुंह की खाते और नेताजी उनकी आँखों के सामने से गायब हो जाते. कितनी ही बार तो ऐसा मंजर बनता की पहरेदार महीनों उनके घर में व कमरे के बाहर इस विचार में डटे रहते की वे घर के भीतर अपने कमरे में ही बन्द है. लेकिन स्थितियां इसके उलट हो जाती और वे शहर और देश से बाहर आसानी से आना-जाना कर लेते थे.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) की कियादत में परतंत्र भारत में समूचे विश्व में फैला तब का या कहे कि अब तक का सबसे शक्तिशाली व श्रेष्ठ गुप्तचर विभाग आज़ादी के लिए तैयार किया गया था जो अपने आप में अंग्रेजी हुकूमत के लिए गले की फांस बना हुआ था.

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