Advertisement
trendingNow,recommendedStories0/zeesalaam/zeesalaam2689871
Zee SalaamZee Salaam ख़बरेंGujarat Riots 2002: कब्रिस्तान और मस्जिद घेरने वाले 6 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी, जानें पूरा मामला

Gujarat Riots 2002: कब्रिस्तान और मस्जिद घेरने वाले 6 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी, जानें पूरा मामला

Supreme Court on Gujarat Riots 2002: सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगा से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए 6 आरोपियों को बरी कर दिया है. फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में सिर्फ मौके पर मौजूद होना या वहां से गिरफ्तार होना यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि वे गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा थे.

Gujarat Riots 2002: कब्रिस्तान और मस्जिद घेरने वाले 6 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी, जानें पूरा मामला

Supreme Court on Gujarat Riots 2002: साल 2002 में गुजरात में गोधरा कांड हुआ था. इस घटना के बाद पूरे राज्य में दंगे फैल गए थे. पुलिस ने इस हिंसा में कई लोगों को आरोपी बनाया और उन्हें जेल भेज दिया. इस हिंसा मामले में लोग सालों तक जेल में हैं. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 6 आरोपियों को बड़ी राहत दी है. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए इन आरोपियों को बरी कर दिया है. फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में सिर्फ मौके पर मौजूद होना या वहां से गिरफ्तार होना यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि वे गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा थे.

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटा
इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ कर रही थी. इस पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के 2016 के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें गोधरा कांड के बाद 2002 के दंगों के मामले में 6 लोगों को बरी करने के फैसले को पलट दिया गया था.जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि सिर्फ मौके पर मौजूद होना या वहां से गिरफ्तार होना यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि वे (6 लोग) एक हजार से ज्यादा लोगों की गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा थे.

क्या है पूरा मामला
गुजरात में गोधरा कांड के बाद भीड़ ने कथित तौर पर वडोदरा गांव में एक कब्रिस्तान और एक मस्जिद को घेर लिया था. इसी मामले में धीरूभाई भाईलालभाई चौहान और 5 दूसरे को मुल्जिम बनाया गया था और सभी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. इस घटना में शामिल लोगों को एक साल की कैद की सजा सुनाई गई थी.

Add Zee News as a Preferred Source

वहीं, निचली अदालत ने सभी 19 मुल्जिमों को बरी कर दिया था, लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने उनमें से 6 को दोषी करार दिया. मामले के विचाराधीन रहने के दौरान 1 आरोपी की मौत हो गई थी. अपीलकर्ताओं समेत 7 लोगों के नाम मुकदमा दर्ज थे. इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में निचली अदालत द्वारा उन्हें बरी करने के फैसले को बहाल रखा है.

सु्प्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, "किसी भी तरह की दोषी भूमिका के अभाव में, मौके पर उनकी गिरफ्तारी 28 फरवरी, 2002 को वडोदरा में हुई घटना में उनकी संलिप्तता के बारे में निर्णायक नहीं है, खासकर तब जब उनके पास से कोई विध्वंसक हथियार या कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई थी." कोर्ट ने आगे कहा, "पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिससे लोग इधर-उधर भागने लगे. ऐसी झड़प में एक निर्दोष व्यक्ति भी अपराधी माना जाता है. इसलिए, मौके पर अपीलकर्ताओं की गिरफ्तारी उनके दोषी होने की गारंटी नहीं है."

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामूहिक झड़पों में, अदालतों की यह सुनिश्चित करने की भारी जिम्मेदारी होती है कि कोई भी निर्दोष व्यक्ति दोषी न ठहराया जाए और उसकी स्वतंत्रता छीनी न जाए. ऐसे मामलों में न्यायालयों को सतर्क रहना चाहिए और ऐसे गवाहों की गवाही पर भरोसा करने से बचना चाहिए जो अभियुक्त या उसकी भूमिका का विशिष्ट संदर्भ दिए बिना सामान्य बयान देते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि अक्सर (विशेषकर जब अपराध का स्थान सार्वजनिक स्थान होता है) लोग उत्सुकता से अपने घरों से बाहर निकल आते हैं कि आसपास क्या हो रहा है. ऐसे लोग सिर्फ दर्शक से ज्यादा कुछ नहीं होते. हालांकि, गवाह को वे गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा लग सकते हैं.

जज ने पुलिस को लगाई फटकार
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, "इस प्रकार, सावधानी के नियम के रूप में न कि कानून के नियम के रूप में, जहां रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत इस फैक्ट को स्थापित करते हैं कि बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे, सिर्फ उन व्यक्तियों को दोषी ठहराना सुरक्षित हो सकता है जिनके खिलाफ प्रत्यक्ष कृत्य का इल्जाम लगाया गया है. कई बार ऐसे मामलों में, सावधानी के नियम के रूप में न कि कानून के नियम के रूप में, न्यायालयों ने बहुलता परीक्षण को अपनाया है. यानी, दोषसिद्धि तभी कायम रह सकती है जब उसे कुछ निश्चित संख्या में गवाहों द्वारा समर्थित किया जाए जो घटना का सुसंगत विवरण देते हैं." 

सुप्रीम कोर्ट ने की हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में अदालत के लिए यह निर्धारित करना महत्वपूर्ण है कि जिस मुल्जिम पर मुकदमा चलाया जा रहा है, वह गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था या सिर्फ दर्शक था. इस तरह का निर्धारण मामले के फैक्ट्स के आधार पर अनुमानात्मक है. इस मामले में अपीलकर्ता उसी गांव के निवासी हैं जहां दंगे भड़के थे, इसलिए घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी स्वाभाविक है. इतना ही नहीं, अभियोजन पक्ष का यह भी मामला नहीं है कि वे हथियार या विध्वंस के उपकरण लेकर आए थे. हाईकोर्ट द्वारा लिया गया विपरीत दृष्टिकोण पूरी तरह से अनुचित है."

About the Author
author img
Tauseef Alam

तौसीफ आलम पिछले चार सालों से पत्रकारिता के पेशे में हैं. उन्होंने देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी जामिया मिल्लिया इस्लामिया से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की है. Amar Ujala,Times Now...और पढ़ें

TAGS

Trending news