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Supreme Court on Hate Speech Case: सुप्रीम कोर्ट ने मॉब वायलेंस और हेट स्पीच को रोकने से जुड़ी एक कंटेम्प्ट पिटीशन पर सुनवाई करने से मना कर दिया है. ऑल इंडिया जमीयत उलेमा-ए-केरल के जरिये फाइल की गई पिटीशन में आरोप लगाया गया था कि कई राज्य सरकारें कोर्ट द्वारा पहले जारी किए गए निर्देशों को असरदार तरीके से लागू नहीं कर रही हैं.
पिटीशनर्स ने दलील दी थी कि देश में मॉब लिंचिंग और हेट स्पीच की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन पक्का करना जरूरी है. उन्होंने मांग की कि कोर्ट राज्यों को सख्त निर्देश जारी करे और गाइडलाइंस को लागू न करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू करे. हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में बड़े पैमाने पर पॉलिसी बनाने और कानून बनाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से एग्जीक्यूटिव और लेजिस्लेचर की है.
कोर्ट ने यह भी इशारा किया कि पहले जारी की गई गाइडलाइंस को लागू करना ज्यूडिशियरी के सीधे एडमिनिस्ट्रेटिव दखल के बजाय राज्य सरकारों और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है. सूत्रों के मुताबिक, सुनवाई के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि हेट स्पीच और वायलेंस से जुड़े मामलों में पहले से ही कई कानून मौजूद हैं, जिनके तहत एक्शन लिया जा सकता है. कोर्ट ने साफ़ किया कि अगर किसी खास मामले में कानून तोड़ा जाता है, तो संबंधित पक्ष सही कानूनी तरीकों से राहत मांग सकते हैं.
याचिका में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया के जरिए फेक न्यूज़, अफवाहें और भड़काने वाला कंटेंट तेजी से फैलता है, जिससे हिंसा का खतरा बढ़ जाता है. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से मॉनिटरिंग सिस्टम को मजबूत करने और जवाबदेही पक्का करने के लिए निर्देश मांगे थे. हालांकि, कोर्ट ने मामले पर डिटेल में सुनवाई करने से मना कर दिया और याचिका पर आगे नहीं बढ़ी. कानूनी जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस उसूल को दिखाता है कि कोर्ट पॉलिसी बनाने की जगह नहीं ले सकता. हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि भीड़ की हिंसा और हेट स्पीच जैसे मामलों पर असरदार कार्रवाई के लिए एडमिनिस्ट्रेटिव इच्छाशक्ति और कानूनों को सख्ती से लागू करना जरूरी है.