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किसी भी मुल्क और समाज की तरक़्क़ी का असल पैमाना उसकी तालीम होती है. सड़कें, पुल, इमारतें और बड़े-बड़े प्रोजेक्ट अपनी जगह अहम हैं, लेकिन अगर बच्चों के हाथ से किताब छिन जाए और स्कूलों के दरवाज़ों पर ताले लगने लगें तो विकास के तमाम दावे खोखले नज़र आने लगते हैं. आज उत्तर प्रदेश की तालीमी सूरत-ए-हाल को लेकर यही सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर हुकूमत की असली तरजीह क्या है-तालीम या सिर्फ़ उसका प्रचार?
घटते स्कूल, बढ़ते सवाल
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में बड़ी तादाद में सरकारी स्कूलों के बंद होने की खबरें सामने आई हैं. कहा जाता है कि नए स्कूल खोलने के बजाय लगभग 26 हज़ार सरकारी स्कूलों को बंद कर दिया गया या उनका विलय कर दिया गया. इसके अलावा 27 हज़ार स्कूलों को एक गोपनीय आदेश के ज़रिए बंद करने की कोशिश भी हुई, जिस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट को दख़ल देना पड़ा. सवाल यह है कि जब देश और प्रदेश की आबादी बढ़ रही है, तब स्कूलों की तादाद क्यों घटाई जा रही है?
इससे भी ज़्यादा फ़िक्र की बात यह है कि स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है. विभिन्न आँकड़ों के मुताबिक़ लाखों बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ चुके हैं. वर्ष 2025 में स्कूल छोड़ने वाले लगभग एक लाख बच्चों में पचास हज़ार लड़कियाँ थीं. जब बेटियाँ ही तालीम से दूर हो जाएँ तो "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" जैसे नारों की असल कामयाबी पर सवाल उठना लाज़िमी है. तालीम से महरूम होने वाली हर लड़की सिर्फ़ एक विद्यार्थी नहीं, बल्कि एक पूरे परिवार और आने वाली नस्ल के बेहतर मुस्तक़बिल का नुकसान है.
बजट का रुख और विज्ञापन का शोर
दूसरी तरफ़ हुकूमत उत्तर प्रदेश के 'शिक्षा मॉडल' का प्रचार प्रदेश से बाहर तक कर रही है. दिल्ली जैसे राज्यों में भी विज्ञापन दिखाई देते हैं. आलोचकों का कहना है कि जब ज़मीनी हक़ीक़त में स्कूल बंद हो रहे हों, बच्चों की तादाद घट रही हो और तालीम का बजट लगातार दबाव में हो, तब करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च करना क्या वाक़ई ज़रूरी है? आरोप है कि शिक्षा बजट से लगभग 160 करोड़ रुपये प्रचार-प्रसार पर खर्च किए गए, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति वर्षों से जीडीपी का 6 प्रतिशत तालीम पर खर्च करने की बात करती रही है. मगर वास्तविकता यह है कि शिक्षा पर खर्च अब भी उस मंज़िल से काफी दूर है.
ज़मीन पर रहने वाले लोग अपनी ज़ुबान में इस हालत को कुछ यूँ बयान करते हैं कि "स्कूल कम हो रहे हैं और ठेके बढ़ रहे हैं." कई इलाक़ों में लोग शिकायत करते हैं कि जहाँ पहले एक शराब का ठेका हुआ करता था, वहाँ आज कई-कई ठेके खुल चुके हैं. यह बात चाहे अतिशयोक्ति हो या हक़ीक़त का एक हिस्सा, मगर यह उस अवामी एहसास की तर्जुमानी करती है जो तालीम की जगह दूसरी चीज़ों को तरजीह दिए जाने पर पैदा हो रहा है.
उस्ताद की मायूसी: सम्मान और रोज़ी का सवाल
तालीम का दूसरा अहम रुक्न शिक्षक होता है. अगर उस्ताद ही मायूसी, असुरक्षा और आर्थिक परेशानियों में घिरा हो तो तालीम का मयार कैसे बेहतर होगा? उत्तर प्रदेश में शिक्षा मित्रों और अनुदेशकों का मसला बरसों से चर्चा में है. शिक्षा मित्र लगभग पच्चीस साल से सेवा दे रहे हैं, लेकिन आज भी उनका मानदेय बेहद कम बताया जाता है. इसी तरह जूनियर हाईस्कूलों के अनुदेशक तेरह वर्षों से अल्प मानदेय पर काम कर रहे हैं.
अनुदेशकों का कहना है कि उनके हक़ में अदालतों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई अहम टिप्पणियाँ और आदेश दिए जा चुके हैं. वे समान कार्य के लिए समान वेतन और लंबे समय से सेवा दे रहे संविदा कर्मियों के नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं. उनका सवाल यह है कि जब सांसद और विधायक अपने वेतन और भत्तों में वृद्धि के लिए तुरंत निर्णय ले सकते हैं, तो वर्षों से बच्चों को पढ़ाने वाले कर्मचारियों के भविष्य पर गंभीर चर्चा क्यों नहीं होती? अगर किसी समाज में उस्ताद का दर्जा और उसकी आर्थिक सुरक्षा कमजोर होगी तो उसका असर पूरी तालीमी व्यवस्था पर पड़ेगा.
तालीम, सियासत और समाज का आईना
इस पूरी बहस का एक सामाजिक और राजनीतिक पहलू भी है. बहुत से लोग मानते हैं कि एक जागरूक और शिक्षित समाज सवाल पूछता है, अपने हक़ पहचानता है और तर्क के आधार पर फैसले करता है. इसके बरअक्स अशिक्षा, बेरोज़गारी और ग़रीबी अक्सर लोगों को निर्भरता और बेबसी की तरफ़ धकेल देती है. यही वजह है कि आम लोगों के बीच यह तंज़ सुनाई देता है:
अनपढ़ रहेगा इंडिया, तभी तो हिन्दू-मुस्लिम करेगा इंडिया
बेरोज़गार रहेगा इंडिया, तभी रैली की भीड़ बनेगा इंडिया
ग़रीब रहेगा इंडिया, तभी मुफ़्त राशन और चुनावी वादों पर वोट देगा इंडिया
चाहे कोई इन बातों से इत्तिफ़ाक़ रखे या न रखे, मगर यह उस बेचैनी और निराशा का इज़हार है जो समाज के एक हिस्से में महसूस की जा रही है. जब पढ़े-लिखे लोग भी अंधविश्वास, अफ़वाहों और भावनात्मक नारों के पीछे चलने लगते हैं, तब लोग तंज़ करते हैं कि अगर तालीम इंसान में सोचने-समझने की सलाहियत पैदा नहीं कर रही तो फिर उसकी अहमियत क्या रह जाती है?
नतीजा: ताले किस पर लग रहे हैं?
आख़िर में सवाल सिर्फ़ स्कूलों, बजट या मानदेय का नहीं है. सवाल यह है कि क्या तालीम को वास्तव में हुकूमत की सबसे बड़ी तरजीह बनाया जा रहा है? क्योंकि स्कूल पर लगने वाला ताला सिर्फ़ एक इमारत को बंद नहीं करता, बल्कि कई ग़रीब बच्चों के मुस्तक़बिल के रास्ते भी बंद कर देता है. शिक्षक का शोषण सिर्फ़ एक कर्मचारी का शोषण नहीं, बल्कि पूरी नस्ल की तालीम पर असर डालता है.
याद रखिए, ज़िंदा क़ौमें अपने बच्चों के लिए स्कूल माँगती हैं, ठेके नहीं. तालीम पर खर्च होने वाला हर रुपया मुल्क के मुस्तक़बिल में निवेश होता है. इसलिए किसी भी हुकूमत की कामयाबी का असल पैमाना विज्ञापन नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि कितने बच्चे स्कूल पहुँच रहे हैं, कितनी बेटियाँ पढ़ रही हैं, और कितने शिक्षक इज़्ज़त व इत्मीनान के साथ अपना फ़र्ज़ अंजाम दे पा रहे हैं.
क्योंकि ताले अगर स्कूलों पर लगेंगे, तो उनकी ज़ंजीरें आख़िरकार पूरे समाज के मुस्तक़बिल को जकड़ लेंगी.
लेखक: निर्देशक मुहम्मद उस्मान एडवोकेट अज़हरी मुस्लिम स्कॉलर