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नई दिल्ली: राजस्थान के उदयपुर में मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में कुलपति सुनीता मिश्रा द्वारा मुगल शासक औरंगज़ेब को एक कुशल प्रशासक बताने पर छात्र विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. लगातार दूसरे दिन मंगलवार को भी छात्रों ने प्रशासनिक भवन के बाहर जमा होकर कुलपति के खिलाफ नारेबाजी की. छात्र नेताओं ने घोषणा की है कि वे कुलपति को उनके दफ्तर में प्रवेश नहीं करने देंगे.
गौरतलब है कि यह विवाद 12 सितंबर को उस वक़्त शुरू हुआ था VC सुनीता मिश्रा ने विश्वविद्यालय के एक प्रोग्राम में कहा था, "ऐतिहासिक नज़रिए से, हम महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान और अकबर जैसे कई राजाओं और सम्राटों के बारे में सुनते हैं. उनमें से कुछ औरंगज़ेब जैसे कुशल प्रशासक भी थे."
VC की इस टिप्पणी के बाद दक्षिणपंथी छात्र समूहों और राजनीतिक संगठनों ने तीखी आलोचना की है, और कुलपति पर औरंगज़ेब का महिमामंडन करने का इलज़ाम लगाया है. हालांकि विवाद बढ़ने के बाद कुलपति ने कहा, "मेरा इरादा औरंगज़ेब की प्रशंसा करना या जनता की भावनाओं को ठेस पहुँचाना कभी नहीं था. अगर किसी की भावनाओं को ठेस पहुँची है, तो मैं तहे दिल से माफ़ी माँगती हूँ." लेकिन उनके सफाई और माफ़ी के बावजूद, छात्रों का विरोध-प्रदर्शन तेज़ हो गया है और आंदोलनकारी कड़ी कार्रवाई पर अड़े हुए हैं.
बढ़ते विवाद के बीच, राज्यपाल हरिबाहु बागड़े और उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा ने सुखाड़िया विश्वविद्यालय से इस घटना के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है.
दरअसल, देश में इस वक़्त लाठी की जोर पर इतिहास बदलने और उसे झुठलाने का दौर चल रहा है, लेकिन जो सच है वो हमेशा सच ही रहेगा. उसे डंडे की जोर पर कभी बदला नहीं जा सकता है. औरंगज़ेब की अगर कुछ नाकामियां है, तो कुछ अच्छाइयां भी हो सकती है. भारत के इतिहास में समुद्रगुप्त और अकबर की तरह लम्बा शासन करने का रिकॉर्ड औरंगज़ेब के नाम ही दर्ज है. औरंगजेब का शासनकाल (1658-1707) मुग़ल साम्राज्य का सबसे बड़ा विस्तार वाला दौर था, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्से पर उसका नियंत्रण था. इस काल में उसका साम्राज्य राजनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद शक्तिशाली था. अगर ऐसा था तो ये बिना प्रशासनिक कुशलता के संभव नहीं था.
दक्कन भर में मुगल हुकूमत का विस्तार किया
औरंगज़ेब को एक भरी-पूरी, लंबी-चौड़ी और मालामाल हुकूमत हासिल हुई थी. उसके वालिद शाहजहां की हुकूमत के दिनों में राज्य की मालगुज़ारी में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ था. शाहजहां को ख़ासतौर पर उसकी इमारती कामों और मंसूबों के लिए याद किया जाता है. आगरे के ताजमहल और दिल्ली की शाहजहानाबाद के लिए उसी ने रक़म दी थी. जबकि औरंगज़ेब का ख़ास ज़ोर हुकूमत की सरहदों को फैलाने पर रहा.
हुकूमत के आख़िर तक औरंगज़ेब बग़ावतों को कुचलने में, सरहदों को फैलाते जाने के लिए बेरहम जंग लड़ने में और संगदिल घेराबंदियों की निगरानी करने में ही लगा रहा. उसकी बादशाहत का आधा वक़्त (1658-81) ख़ासतौर पर इस ख़ुशी को महसूस करते हुए गुजरा. हालांकि कुछ ऐसे भी मौके आए जब मुगलिया हुकूमत को बढ़ाने के लिए वो अपनी फ़ौज के क़दम वापस खींचने में भी नहीं हिचका. 1660 में उसने मराठा सरदार शिवाजी को फुसलाकर मुगल हुकूमत के सर पर टंगा मराठा नाम का खतरा दूर करने की कोशिश की थी. लेकिन जब सीधी उंगली से बात न बनी तो उसने उंगली टेढी करने में भी देर नहीं की और मराठों के खिलाफ मारकाट और जंग का रुख इख्तियार कर लिया. यह जंग ताउम्र चली और इसमें उसे बड़ी सीमित-सी कामयाबी ही हासिल हो सकी. औरंगजेब ने उनको भी नहीं बख्शा जो उसकी नज़र में शिवाजी को मुगलों की कैद से भगाने में मदद करने वालों में शामिल थे. बनारस और मथुरा के मंदिरों को तबाह करने के पीछे उसका यही मकसद था. हुकूमत के शुरुआती दौर में उसने मुगल सल्तनत पर मंडराते सैकड़ों ख़तरों का सामना किया और किसी पर भी रहम नहीं दिखाया.
दक्कन को शाही सरहदों में शामिल करने के इरादे से औरंगज़ेब 1681 में समूचे दरबार समेत दक्कन को फिर से आबाद करने का नायाब क़दम उठाया. दक्कन को क़ाबू करने की कोशिशें उससे पहले दूसरे मुग़लों ने भी की थीं. ये कोशिशें औरंगज़ेब के परदादा अकबर से ज़माने से चली आ रही थीं. कुछ बादशाहों ने दक्कन पर चढ़ाई करने की कोशिश की थी, लेकिन औरंगज़ेब वह पहला बादशाह था, जिसने दक्कन भर में मुगल हुकूमत का विस्तार किया.औरंगज़ेब ने अपनी बादशाहत का उत्तरार्द्ध (1681-1707) बड़े पैमाने पर मुगल हुकूमत के पांव पसारते हुए दक्षिण में खर्च किया.
बुराइयों को रोकने के प्रयास किये, लेकिन नाकाम रहा
मुगल हिंदुस्तान की आवाम में अख़लाक़ क़ायम करने के लिए औरंगजेब ने जिन बुराइयों को रोकने की या उन पर पाबंदी लगाने की कोशिश की, उनमें ये चीजें शामिल थीं जिस्मफरोशी (वेश्यावृत्ति), जुआ, भड़काऊ किस्म की मज़हबी किताबत (लेखन) और मजहबी त्योहारों पर सार्वजनिक जश्न मनाया जाना. मूहतसिबों (नियंत्रकों, सेंसर्स) पर अख्लाकी कायदे ज़बरन लादे गए थे. शराब पीने की लत पर रोक लगाने की औरंगज़ेब की कोशिश उसकी हुकूमत की सबसे नुमायां नाकामियों में से एक रही. शराब को गैर-इस्लामी कहकर उसकी बड़े पैमाने पर बुराइयां की गई हैं. मुग़ल बादशाह मज़हब की लक़ीरों से परे रहते हुए शराब के परहेज़ को बढ़ावा देने के लिए उनकी तारीफें करते रहे जो इस परहेज़ को अपनाए हुए थे. उदाहरण लिए, जैन साधु शांतिचंद्र ने 1590 के आसपास लिखा कि अकबर ने जब दारू-बंदी की तो इसकी सरेआम फजीहत तो होनी ही थी. जहांगीर ने भी (खुद माहिर शराबी होने के बावजूद ) शराब पर रोक लगाने का दावा किया था. शराब के मसले में इन रोक और पाबंदियों को बार-बार दोहराया जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि वे लगातार बेअसर बनी रहीं.
ईनाम के हक़दार हिंदू
औरंगज़ेब के यहां नौकरी करने वाले एक हिन्दू फ़ारसी कवि चंद्रभान ने लिखा है, औरंगजेब की लंबी-चौड़ी नौकरशाही में हिंदुओं को रोज़गार और आगे बढने के मौकों के साथ अच्छा सुलूक भी मिला. अकबर के जमाने से ही राजपूत और दूसरे हिंदू मुगलों के यहां हुकूमत का बंदोबस्त करने वाले (प्रशासनिक) महकमों में अपनी सेवाएं देते आ रहे थे. मुस्लिम सहकर्मियों की तरह उन्हें भी औपचारिक ओहदे दिए जाते थे जिन्हें मनसब कहा जाता था. इन मनसबों के आधार पर ही हुकूमत के कामकाज में उनके रुतबे तय होते थे. वामपंथी इतिहासकार लिखते हैं कि औरंगज़ेब अगर कुछ मंदिरों को तोड़ने के हुक्म दिया था, तो कुछ मंदिरों को वो दिल खोलकर दान भी देता था. उन्हीं मंदिरों को तोड़ा जहाँ उसे किसी अनैतिक काम की सूचना मिलती थी. हालांकि, दक्षिणपंथी इतिहासकार इसे औरंगज़ेब के हिन्दू उत्पीड़न पर पर्दा डालने वाला तथ्य बताते हैं.
लंबी-चौड़ी सरहदों का रक्षक लेकिन भ्रष्टाचार पर नहीं लगा पाया अंकुश
औरंगज़ेब : सच्चाई और गल्प किताब में अमेरिकन इतिहासकार आद्रे ट्रैशके लिखती हैं, औरंगज़ेब अपने इतने बड़े साम्राज्य की निगरानी करता रहा, जिसे संभालने के लिए नौकरशाहों की एक पूरी फ़ौज चाहिए थी. साम्राज्य के ज़्यादातर हिस्सों में वह लगातार आवाज़ाही नहीं कर पाया. इसके बजाय उसने अपनी हुकूमत का आधा वक़्त ख़ासतौर पर दिल्ली दरबार में और बचा हुआ आधा वक़्त दक्षिण-अभियान में खर्च किया. लिहाज़ा मुग़ल हुकूमत को चलाने के लिए सरकारी अफ़सरों को अपने कंधे लगाने पड़े.
औरंगजेब को सबसे ज़्यादा दिलचस्पी बुनियादी क़ानून और अमन (न्याय और व्यवस्था) से और मुग़ल हुकूमत के नुमाइंदों के रंग-ढंग और सुलूक से जुड़ी खबरें सुनने में थी. ये पहलू अक्सर उन कमियों और खामियों को खोलकर सामने ला देते थे, जो इतनी बड़ी हुकूमत को चलाने की उसकी कोशिश के दरम्यान आ जाया करती थीं.
औरंगजेब ने मुग़ल साम्राज्य में बुनियादी क़ानून और अमन क़ायम करने की दिशा में गहरी चिंता दिखाई. वह अपने बेटों को और कुछ ख़ास अमीरों को बार-बार रास्तों की हिफ़ाज़त सुनिश्चित करने के बारे में लिखता रहा. उसने उन्हें आम रियाया के ख़िलाफ़ हो रहे जुर्म और चोरी चकारी न रोक पाने के लिए झिड़का भी. लेकिन उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद बुनियादी क़ानून और अमन के मसले में मुग़ल हिंदुस्तान मुसीबतज़दा बना रहा. उसकी हुकूमत का अंत नज़दीक आते-आते तो यह मुसीबत शायद अपने सबसे ऊंचे पैमाने पर जा पहुंची थी. इस वक़्त तक मुगलिया फ़ौजें कमज़ोर पड़ चुकी थीं. दशकों जंग में ख़ुद को खपाए रखने से वे मुरझा चुकी थीं. नए रंगरूटों में मुग़लों के लिए वफ़ादारी का वह जज़्बा भी नहीं था. 1690 के मध्य में इतालवी यात्री गेमिली कारेरी ने शिकायत की कि ईरान के सफ़वी और ऑटोमन सल्तनतों के महफूज रास्तों के उलट मुगलिया हिंदुस्तान राहगीरों की 'चोरों से हिफ़ाज़त' नहीं करता. औरंगज़ेब ने खुद भी इस बात का अफसोस जताया कि जब डाकुओं के गिरोह बुरहानपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों के क़रीब लूट-पाट कर लेते हैं, तो वे लोग जो गांव में हैं, वे यक़ीनन कहीं ज़्यादा बड़े हमले झेलते हैं.
औरंगज़ेब ने उन सरकारी नौकरशाहों पर भी नकेल कसने की कोशिश की जिनका बर्ताव दोमुंहा था. औरंगज़ेब की सख्त हिदायतों के बावजूद अफसर लगातार रिश्वत लेते रहे. यहां तक कि मुगलों की आवाम के लिए ईमान की रहनुमाई करने वाला (नैतिकता की राह दिखाने वाला) काजी-ए-ममालिक (प्रमुख न्यायाधीश) अब्दुल वाहब खुद भी रिश्वत लेता था. अठारहवीं सदी का एक हिंद फारसी ग्रंथ कहता है कि 'उसकी (अब्दुल वाहब) आस्तीनें इस क़दर लंबी थीं कि उनमें वह रिश्वत में ली गई रकम रख लेता था.
बेईमानी और गुनहगार रवैया औरंगजेब को खिजाकर रख देता था. वह चौड़ी रक़म मछलियों की तरह फांसता जाता था.' नौकरशाहों की यह उनकी इन गैर-मुनासिब हरकतों की भरपूर भर्त्सना भी करता था. उदाहरण के लिए, अपने पोते बिदारबख्त को लिखे एक खत में उसने रिश्वतखोर अमीरों के नामों का जिक्र करते हुए सलाह दी है कि 'हकूमत बगैर सज़ा के खड़ी नहीं हुआ करती. लेकिन बादशाह अपने आदमियों के प्रति नरमी भी बरतता था. उसने शाही अफ़सरों को झिड़कने वाले अपने बेटों को भी सजा दी.
औरंगज़ेब के एक हिंदू मुलाज़िम भीमसेन सक्सेना ने फ़ारसी में लिखा है कि शाहजहां हफ्ते में एक बार दरबार लगाता था. उन दिनों सच आंख का तारा हुआ करता था और परवरदिगार की दुआओं का असर ऐसा था कि किसी को शिकायती अर्जियां लाने की ज़रूरत ही न पड़ती थी. नया बादशाह एक रोज़ में दो बार दरबार बिठाता है और शिकायती अर्जियों की भीड़ है कि बढ़ती ही जाती है.'
जमीनी तौर पर जजिया की बहाली से औरंगजेब ताक़तवर उलेमाओ पर बहुत मज़बूत शिकंजा नहीं कस पाया. बहुत से समकालीनों ने जलिया वसुली के वक्त की जा रही बदसलूकी के खिलाफ इस हद तक आवाज बुलंद की कि जजिया का एक बड़ा हिस्सा वसूली करने वाले लालचियों की जेबों तक पहुंचने की राह खोज ही न पाया. ऐसी चोरी को रोकने में औरंगज़ेब नाकाम रहा.
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