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नई दिल्ली: दिल्ली का जामिया मिलिया इस्लामिया आज अपना 105 वां स्थापना दिवस मना रहा है. आज ही के दिन साल 1920 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में जामिया की संगे बुनियाद रखी गई थी. बाद में इसे अलीगढ़ से दिल्ली के करोल बाग में शिफ्ट किया गया और फिर ओखला में इसका एक खूबसूरत कैंपस बनाया गया. तभी से जामिया मिलिया इस्लामिया तालीम के शोबे में अपना नुमाया किरदार अदा कर रही है, और आज ये देश की टॉप 5 यूनिवर्सिटी में शुमार हो चुकी है.
जामिया मिलिया इस्लामिया के फाउंडेशन डे के मौके पर केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री किरण रीजीजू ने यूनिवर्सिटी के सामाजिक, सांकृतिक और तालीमी रोल को देखते हुए कहा कि जामिया का आदर्श वाक्य हमारे राष्ट्र के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है. उन्होंने लोकतंत्र में खुली बहस की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि हमारे मुक्ज के जम्हूरी निजाम में लोग अपने विचार स्वतंत्र होकर एक्सप्रेस करते हैं. यह तब तक बुरा नहीं है, जब तक कि इससे देश को कोई नुकसान न पहुंचे. उन्होंने कहा कि आज यहाँ से ये पावरफुल मैसेज जामिया से जाना चाहिए कि हमारा देश और सामाज लोकतांत्रिक रूप से कितना मजबूत और समृद्ध है?
इस मौके पर किरण रिजीजू ने देश की समाजी एकता और समरसता पर बात करते हुए इसे सभी की सामूहिक जिम्मेदारी करार दिया है. साथ ही उन्होंने उर्दू जबान की तारीफ करते हुए कहा कि उर्दू से ज्यादा अच्छी ज़बान पूरी दुनिया में नहीं है. मुझे यहां आकर ऐसा लग रहा है कि उर्दू ज़बान नहीं पढ़ना मेरी कमजोरी है. इसके साथ ही उन्होंने जामिया की तर्क्कियाती कामों का जिक्र करते हुए इसमें अपना हर मुमकिन तआवुन देने का वादा किया.
जामिया ने अपने अबतक के सफ़र में, 1920 से मौजूदा वक़्त तक कई उतार चढाव का सामना किया है. इसने न सिर्फ देश की सामाजिक, सियासी और आर्थिक तरक्की में योगदान दिया बल्कि ये अपने स्थापना के वर्ष से ही भारत जैसे एक गुलाम और मज़लूम मुल्क को आज़ादी का रास्ता दिखाने का काम किया है.
इस यूनिवर्सिटी ने महात्मा गांधी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल ख़ान, जाकिर हुसैन और मुख्तार अहमद अंसारी जैसे अपने संस्थापको के खवाबों को हकीकत में बदलने का काम किया है. इसने देश में जम्हूरियत के नीव को मजबूत किया है. यही वजह है कि जामिया के मुख्तार अहमद अंसारी, डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, ब्रिगेडियर उस्मान और अनवर जमाल किदवई जैसे संस्थापकों और महान आत्माओं को मरने के बाद भी उनके इसी बगिया में दफना दिया गया, ताकि आने वाली नस्लें उनसे प्रेरणा लेती रहे.
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