होली और जुमे की नमाज एक ही तारीख पर आने से देश के कई सूबों में प्रशासन की खास तैयारी चल रही है. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब दो समुदायों की त्योहार एक तारीख को पडा है. साल 1999 में ऐसे ही हाज यात्रियों के जाने की दिन और होली एक ही तारीख को पड़ा था. उस दिन किस तरीके से प्रशासन ने सिचुएशन को अंडर कंट्रोल रखा. इस खबर में हम विस्तार से जानेंगे.
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भारत में होली का त्योहार शुरू हो चुका है. इस मौके पर मुल्क के कई सूबों में प्रशासन की खास चौकसी देखी जा रही है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत बिहार जैसे राज्यों में प्रशासन होली और जुमे की नमाज को देखते हुए अलर्ट पर है. उत्तर प्रदेश के संभल में प्रशासन की खास तैयारी देखी जा रही है, क्योंकि हाल ही में यहां शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा हुई थी, तब से इस इलाके कों सेंसिटिव माना जा रहा है. हालांकि मुल्क में इससे पहले भी कई मौकों पर दो समुदाय का त्योहार एक ही तारीख को पड़ा था, और उस वक्त भी प्रशासन ने अपनी मुस्तैदी और सूझबूझ से दो समुदायों के बीच किसी संभावित हिंसा को रोकने के लिए कदम उठाया था. साल 1999 में होली और हज तीर्थयात्रा एक साथ हो रही थी. उत्तर प्रदेश के कुछ संप्रदायिक इलाकों में इस मौके पर पुलिस ने लॉ एण्ड आर्डर को बनाए रखने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला लिया था.
साल 1999 में वह होली का दिन था, जब हज करने जा रहे मुस्लिम समुदाय के लोगों को उत्तर प्रदेश के एक शहर मऊ से ट्रेन पकड़नी थी. यह ट्रेन मऊ से दिल्ली के लिए जा रही थी. मऊ शहर को उस वक्त संप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता था. प्रशासन दो समुदायों के बीच किसी भी तरह की अनहोनी को नहीं होने देना चाह रहा था. इलाके के माहौल को देखते हुए प्रशासन को ट्रेन के लोको पायलट पर निषेधाज्ञा लगानी पड़ी थी, ताकि होली में शामिल कोई भी हुड़दंगी किस्म के लोग हज यात्रियों पर रंग न डाल सके.
गौरतलब है कि बिहार के गया के रहने वाले 1983 बैच के आईपीएस और उत्तर प्रदेश को पूर्व डीजीपी ओ पी सिंह ने अपनी किताब ' थ्रू माई आइज: स्केचेस फ्रॉम कॉप्स नोटबुक' में उस दिन का खास और बारीकी से जिक्र किया है. उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने रेलवे से इलाके की स्थिति को देखते हुए खास अपील थी कि होली का त्योहार पूरा होने तक दोपहर में पहुंचने वाली ट्रेन को कुछ घंटे लेट किया जाए. लेकिन रेलवे ने पुलिस की अपील को मानने से इंकार कर दिया था, जिसके बाद मऊ में अधिकारियों ने लोको पायलट (ट्रेन चालक) पर निषेधाज्ञा लगा दी थी. राज्य पुलिस के पूर्व प्रमुख ने 'सीआरपीसी की धारा 144 के तहत ट्रेन' हेडिंग वाले चैप्टर में कहा है कि भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि सीआरपीसी की धारा 144 के तहत गैरकानूनी तरीके से इकठा हुए भीड़ को रोकने के लिए नहीं बल्कि ट्रेन को रोकने के लिए इस्तेमाल किया गाया था.
उन्होंने किताब में लिखा है कि उस साल होली के दिन ही बड़ी तादाद में हज यात्रियों को रवाना होना था. हाजियों का पहला पड़ाव दिल्ली था. जहां से वे हवाई जहाज की मदद से मक्का के लिए रवाना होने वाले थे. ट्रेन दोपहर के वक्त पहुंचने वाली थी. ठीक उसी वक्त होली का त्योहार अपने चरम पर होता है. सफेद कपड़े पहने मुस्लिम तीर्थयात्रियों के लिए, सड़कों पर होली के माहौल में फंसने से बच निकलने की गुंजाइश न होने को जिला प्रशासन ने पहले ही भांप लिया था. जिले में सांप्रदायिक झड़पों के इतिहास के मद्देनजर पुलिस अधिकारियों ने रेलवे के अफसरों से मदद मांगी और गुजारिश की कि ट्रेन को कुछ घंटों के लिए लेट कर दिया जाए. हालांकि, रेलवे ने इस अपील को मानने से इनकार कर दिया. रेलवे ने दलील दी कि ट्रेन की वक्त में बदलाव नहीं किया जा सकता है, चाहे स्थिति कितनी भी नाजुक क्यों न हो.
पूर्व डीजीपी ने कहा कि रेलवे द्वारा अपील न मानने और सांप्रदायिक हिंसा की आशंका को भांपते हुए, जिला प्रशासन ने एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए निषेधाज्ञा ऑर्डर सीधे ट्रेन ड्राइवर को दिया गया, जिससे ट्रेन को पड़ोसी जिले में रेलवे स्टेशन से आगे बढ़ने से कानूनी तौर पर रोक दिया गया. पुस्तक में कहा गया है कि पुलिस और अन्य सरकारी अधिकारियों को ट्रेन के साथ तैनात किया गया था. ट्रेन कुछ घंटों तक रुकी रही, तकनीकी खराबी या वक्त-निर्धारण में देरी की वजह से नहीं, बल्कि कानून का इस्तेमाल कर के ऐसा किया गया था. कुछ घंटे बाद बिना किसी परेशानी के तीर्थयात्री ट्रेन में सवार हो गए, और दो समुदाय के बीच कोई नोक-झोंक की खबर नहीं आई.