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नई दिल्ली: गुज़िश्ता महीने 29-30 अगस्त की रात को लद्दाख के पैंगोंग झील के दक्षिणी (जनूब) हिस्से से कब्ज़ा करने की नियत से आए 500 चीनी फौजियों के दांत खट्टे करने वाली Special Frontier Force (SFF) हिंदुस्तानी फौज का एक अहम हिस्सा है. इस फोर्स का कयाम खास तौर पर चीनी फौज के खिलाफ खुफिया तरीके से ऑपरेशन अंजाम देने के लिए किया गया था.
शुरू में इसमें 5,000 जवान थे जिनकी ट्रेनिंग के लिए देहरादून के चकराता में नया ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया. शुरुआत में पहाड़ों पर चढ़ने और गुरिल्ला युद्ध के गुर सीखे. एसएफएफ का कयाम 14 नवम्बर 1962 को किया गया. इस फोर्स की खास बात यह है कि इसमें हिन्दुस्तान में रह रहे तिब्बती तबके के जवान भर्ती होते हैं.
कई ऑपरेशन दे चुकी है अंजाम
साल 1971 की जंग में चटगांव के पहाड़ियों को 'ऑपरेशन ईगल' के तहत महफूज़ करने में SFF का रोल था. उस ऑपरेश में रेजिमेंट के 46 जवान शहीद हुए थे. 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार में भी SFF कमांडोज़ शामिल थे जिसमें अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को खाली कराया गया. सियाचिन की चोटियों पर जब हिंदुस्तान ने 'ऑपरेशन मेघदूत' लॉन्च करने का फैसला किया तो भी SFF को याद किया. 1999 में करगिल जंग के दौरान भी SFF 'ऑपरेशन विजय' का हिस्सा थी.
सीधे PM को करती है रिपोर्टिंग
बता दें कि फ्रंटियर फोर्स के मूवमेंट की किसी को भनक नहीं होती, मतलब इससे ये समझा जा सकता है कि यह कितनी खुफिया है. SFF डायरेक्टर जनरल ऑफ सिक्योरिटी के ज़रिए सीधे मुल्क के वज़ीरे आज़म को रिपोर्ट करती है. स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के कयाम के बाद से कई बड़े ऑपरेशंस को अंजाम दे चुकी है.
बता दें कि 29-30 अगस्त की रात लद्दाख के पैंगोंग झील के दक्षिणी (जनूब) में चीन के फौजियों ने कुछ इलाकों पर कब्ज़ा करने की कोशिश की. चीन के करीब 500 फौजी इस गैरकानूनी कब्जे़ के लिए आए थे. उनके पास रस्सी और चढ़ाई के दूसरे कई औजार भी थे. रात के अंधेरे में ब्लैक टॉप और थाकुंग हाइट्स के बीच टेबल टॉप इलाके पर चीनी फौजियों ने चढ़ाई शुरू की लेकिन SFF के जवान पहले से मुस्तैद थे. स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ने चीनी फौज को पहले रोका और फिर पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया. चीन पैंगोंग के थाकुंग इलाके में टशन से आया था लेकिन एसएफएफ की हिम्मत देखकर टेंशन में लौट गया.