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मंटो ने लिखा हैं यह मत कहिए कि- हजारों हिंदू मारे गए, हजारों मुसलमान मारे गए. सिर्फ यह कहिए कि हजारों इंसान मारे गए और यह भी इतनी बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि हजारों लोग मारे गए ,सबसे बड़ी त्रासदी तो यह है कि हजारों लोग बेवजह मारे गए.
सर मोहम्मद इकबाल और फैज अहमद फैज की तरह भारतीय उपमहाद्वीप में खासे लोकप्रिय हैं. मंटो ने खुद अपने बारे में यह कहा - ऐसा होना मुमकिन हैं कि सआदत हसन मर जाए और मंटो जिंदा रहे. उनके गुजरने के कई वर्षों बाद भी उनकी प्रासंगिकता आज भी कायम हैं. साहित्य को समझने वाला हर शख्स मंटो से जरूर वाकिफ़ होगा. मुल्कों का होना मनुष्यता के लिए एक कटघरे से ज्यादा नहीं जैसी सोच रखने वाले मंटो पंछी, नदियां और हवा के झोंके की तरह एक मुल्क के दायरे में बंधने वाले शख्स नहीं थे. देश के बंटवारे का दर्द हमेशा उन्हें सालता रहा. वह इंसानों द्वारा खींची गई सरहदों के खिलाफ थे. इस बात की तस्दीक उनकी मशहूर कहानी टोबा टेक सिंह का किरदार बिशन सिंह करता हैं. बिशन सिंह के के माध्यम से मंटो अपने जज्बात को रखते हैं, सही मायने में खुद को नो मैन्स लैंड में भटकता हुआ महसूस करते थे.
ताउम्र सत्ता से खफ़ा रहने वाले मंटो हमेशा से जम्हूरियत के हिमायती थे. जीवन पर्यंत आम आवाम और इंसानियत के हक में अपनी आवाज को बुलंद करते रहे. उनकी रचनाओं में भी हाशिए पर पड़े आदमी की कहानियां सहज मिल जाती हैं. मंटो हमेशा हुकूमत और हुक्मरानों के दायरे से बाहर रहे. बंटवारे के बाद भले ही उनके मुल्क का नाम पाकिस्तान हो गया, पर उनके दिल में हमेशा हिंदुस्तान समाया हुआ था. वह किसी भी समाज और सत्ता के बेलगाम रवैए के हमेशा मुखर आलोचक रहे. मंटो एक लोकतांत्रिक व्यक्ति थे, इस बात की तस्दीक उनकी रचनाएं करती हैं. तत्कालीन परिस्थितियों से उपजी पीड़ाओं का आधार बनाकर अपनी हर रचना में मानवीय संवेदनाओं को उकेरा, खासकर नारी पात्रों के. वह स्त्री मन की कोमलता और विवशता को बखूबी समझते थे.
सआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पंजाब के लुधियाना के गांव पपड़ौदी में हुआ था. उनके जन्म के कुछ दिनों बाद उनका परिवार अमृतसर चला गया. उनकी प्राथमिक शिक्षा घर पर हुई. सन 1931 में उन्होंने मैट्रिक पास की और उसके बाद हिंदू कॉलेज में एफ.ए में दाखिला लिया. मात्र 43 साल की उम्र में, इस महान रचनाकार ने 18 जनवरी 1955 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
मंटो की लेखनी के मुरीद तब भी थे और अब भी हैं. पर उन पर हमेशा अश्लीलता का आरोप लगा, जिसे मंटो खुद खासा तवज्जो नहीं देते थे. मंटो की रचनाएं सभ्य समाज के गाल पर तमाचा मारती थी. मंटो ने अपनी कथाओं के माध्यम से सामाजिक खोखलेपन और विसंगतियों को उजागर किया. वह सभ्यता, समाज और संस्कृति के ठेकेदारों के घोर आलोचक थे. सही मायनों में वह वक्त से आगे के लेखक थे, जो वह इंसानी मनोविज्ञान को बखूबी समझते थे. जिसकी झलक उनकी हर रचना में देर- सबेर मिलती हैं. मंटो अपने समकालीन कृश्न चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी ,इस्मत चुगताई और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे दिग्गजों के बीच में अपनी अलग पहचान रखते थे.
मंटो ने साहित्य, फिल्म, रेडियो, पत्रकारिता, संस्मरण हर विधा में अपनी कलम चलाई. देश के विभाजन के पश्चात दंगों और संप्रदायिकता को आधार बनाकर मंटो ने एक से बढ़कर एक रचनाएं रची. उनके द्वारा रचित टोबा टेक सिंह, खोल दो, बू, काली सलवार और ठंडा गोश्त प्रासंगिकता आज भी कायम हैं. अपनी रचना मीना बाजार में उन्होंने अपने संस्मरण दर्ज किए हैं.
14 अगस्त 2012 को पाकिस्तान की स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, वहां की सरकार द्वारा राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-इम्तियाज द्वारा मरणोपरांत उनको नवाजा गया.
मंटो फर हमेशा अश्लीलता का आरोप लगा. इस वजह से उन्हें कई बार अदालतों के चक्कर भी काटने पड़े. मंटो को अपनी कहानी बू और इस्मत चुगताई को अपनी कहानी लिहाफ के लिए लाहौर की अदालत में पेश होना पड़ा.
भारतीय उपमहाद्वीप में मंटो की लोकप्रियता आज भी कायम हैं. मशहूर कला अभिनेत्री नंदिता दास द्वारा 2018 में मंटो नाम से फिल्म बनाई, जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने मुख्य भूमिका अदा की थी.
ए.निशांत
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.