Who will become Vice President: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया. इस इस्तीफे के बाद 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है. बीजेपी और एनडीए के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा हो रही है. वहीं, कांग्रेस और विपक्ष भी रणनीति बना रहा है. इस बीच, खबर आई है कि बीजेपी संसदीय बोर्ड 17 अगस्त को एक बैठक करने जा रहा है, जिसमें उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगेगी.
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Vice President Election 2025: राजनीति में अक्सर कहा जाता है, “यहां कुछ भी संभव है." यह कहावत 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में सच साबित हुई थी, जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम अचानक राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया. अब जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपराष्ट्रपति चुनाव की तैयारियां चल रही हैं और एक बार फिर एनडीए और भारत गठबंधन अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं, लेकिन बीजेपी एक बार फिर ऐसा कदम चल सकती है जिससे विपक्ष चौंक जाए.
हाल ही में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इस फैसले ने राजनीति को हिलाकर रख दिया और अब उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं. भाजपा और एनडीए ने अपने उम्मीदवार के नाम को अंतिम रूप देने के लिए गहन बातचीत शुरू कर दी है. जराए के मुताबिक, बीजेपी संसदीय बोर्ड की एक अहम बैठक 17 अगस्त को होगी, जिसमें उम्मीदवार पर अंतिम मुहर लगेगी.
उपराष्ट्रपति पद की दौड़ में कई बड़े नाम सामने आए हैं. खास बात यह है कि इस बार भी बीजेपी दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह किसी मुस्लिम उम्मीदवार को उतारकर विपक्ष को चौंका सकती है. सबसे चर्चित नाम बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का है. वहीं, बीजेपी और एनडीए की बैठक से पहले संभावित उम्मीदवारों को लेकर कई नामों पर चर्चा हो रही है.
इन नामों पर चल रही महामंथन
बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं. उनके अलावा, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना, कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत, सिक्किम के राज्यपाल ओम माथुर, गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और आरएसएस विचारक शेषाद्रि चारी के नामों पर चर्चा हो रही है. इनमें से आरिफ मोहम्मद खान का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में है. अगर बीजेपी उन्हें उम्मीदवार बनाती है, तो यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा.
साल 2002 में थे ऐसे हालात
आज के हालात को समझने के लिए हमें 2002 में वापस जाना होगा. उस समय राष्ट्रपति इलेक्शन होने थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी नहीं चाहते थे कि के.आर. नारायणन दोबारा राष्ट्रपति बनें. नारायणन ने कई मौकों पर सरकार को असहज किया था. शुरुआत में एनडीए की तरफ से महाराष्ट्र के राज्यपाल पी.सी. एलेक्जेंडर का नाम लगभग तय था. कांग्रेस उपराष्ट्रपति कृष्णकांत को आगे बढ़ाना चाहती थी, लेकिन अचानक घटनाक्रम बदला और एक ऐसा नाम सामने आया जिसने पूरी राजनीति की दिशा ही बदल दी. वह नाम था मिसाइल मैन के नाम से मशहूर देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का.
ऐसे बदल गई पटकथा
5 जून 2002 को एनडीए नेताओं की बैठक हुई और पीसी एलेक्ज़ेंडर, बाल ठाकरे और शरद पवार के नामों पर चर्चा हुई. एलेक्ज़ेंडर पर लगभग सहमति बन गई थी, लेकिन विपक्ष और सहयोगियों से बात करने की योजना बनी. 8 जून को स्थिति बदल गई. सहयोगी दलों को कृष्णकांत पसंद नहीं थे और नारायणन को लेकर भी मतभेद थे. उस समय सरकार दुविधा में थी, तभी 9 जून की शाम आडवाणी के आवास पर एक अहम बैठक हुई. इस बैठक में जॉर्ज फर्नांडिस, प्रमोद महाजन और वेंकैया नायडू मौजूद थे. चर्चा के दौरान डॉ. कलाम का नाम सामने आया और सभी ने सहमति जताई. वाजपेयी ने फौरन कलाम से फ़ोन पर बात की. उन्होंने विनम्रता से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. इस तरह, कुछ ही घंटों में राजनीति की पटकथा बदल गई.
कलाम के नाम के आगे विपक्ष ढेर
कलाम के नाम ने विपक्ष की पूरी रणनीति बिगाड़ दी. कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच दरार पड़ गई. समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव पहले ही कलाम का नाम आगे कर चुके थे. आखिर में लगभग सभी दलों ने कलाम का समर्थन किया. जुलाई 2002 में जब चुनाव हुए, तो डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भारी बहुमत से भारत के 12वें राष्ट्रपति चुने गए. यह चुनाव इस बात का प्रमाण था कि भारतीय राजनीति में आखिरी क्षण में भी बड़े उलटफेर संभव हैं.
क्या 2025 में इतिहास खुद को दोहराएगा?
अब सवाल यह है कि क्या बीजेपी 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में भी यही रणनीति अपनाएगी? अगर आरिफ मोहम्मद खान को उम्मीदवार बनाया जाता है, तो यह न सिर्फ़ विपक्ष के लिए एक चुनौती होगी, बल्कि भाजपा की तरफ से एक कड़ा संदेश भी माना जाएगा. क्योंकि बीजेपी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है और प्रधानमंत्री मोदी एनडीए गठबंधन में कोई जोखिम नहीं लेना चाहेंगे. ऐसे में माना जा रहा है कि पीएम मोदी मुस्लिम कैंडिडेट देकर विपक्ष को चौंका सकते हैं. हालांकि, विपक्ष अब भी दुविधा में हैं. विपक्ष को लगता है कि अगर बीजेपी किसी मुस्लिम कैंडिडेट को मैदान में उतारती है, तो उसका खुलकर विरोध करना आसान नहीं होगा. यही रणनीति 2002 में भी काम आई थी, जब विपक्ष को कलाम के समर्थन में उतरना पड़ा था.