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इस्लामाबादः उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election) के लिए ‘इस्लामाबाद’ के मतदाता (Voters of Islamabad) अपना वोट डालने और जनप्रतिनिधि चुनने के मौके का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. लेकिन आप इस्लामाबाद का नाम सुनकर चौकें नहीं क्योंकि यह पाकिस्तान की राजधानी नहीं बल्कि बिजनौर जिले का एक गांव (Islamabad Village in Bijnaur district of Uttar Pradesh) है. यह बरहापुर विधानसभा क्षेत्र के तहत आता है, जहां 14 फरवरी को मतदान होना है. पड़ोसी देश पाकिस्तान की राजधानी से मिलता-जुलता 'इस्लामाबाद’ नाम का यह गांव बिजनौर जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां लगभग दस हजार की आबादी निवास करती है. इस गांव में 4700 मतदाता रहते हैं. हर चुनाव में अपने नाम की वजह से यह गांव और यहां के लोग खबरों में बने रहते हैं. आईए, इस चुनाव में क्या राजनीति और अपने गांव के नाम को लेकर क्या सोचते हैं इस गांव के मतदाता; जानते हैं उनका नजरिया.
गांव के नाम पर गर्व करते हैं यहां के निवासी
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2017 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज, फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या और मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय नगर कर दिया गया. कई शहरों का नाम बदलने के लिए क्षेत्रीय विधायकों और नागरिकों ने अर्जी भी लगाई है. ऐसे में क्या इस गांव के नाम को बदलने का भी कोई प्रस्ताव है ? इस सवाल पर गांव की प्रधान सर्वेश देवी के पति विजेंद्र सिंह ने कहते हैं, "मुझे नहीं पता कि इस गांव का नाम इस्लामाबाद कैसे पड़ा, लेकिन मैं यह नाम बचपन से सुन रहा हूं और यही नाम मेरे परदादा के जमाने से प्रचलित है. आजादी के करीब 75 वर्ष बाद भी इस्लामाबाद नाम यहां के लोगों को असहज नहीं करता है. यहां के लोग अपने गांव का नाम खुशी-खुशी लेते हैं और इस पर नाज करते हैं."
नाम को लेकर किसी को नहीं होती कोई परेशानी
यह पूछे जाने पर कि क्या गांव के नाम ने कभी ग्रामीणों में भय या असुरक्षा की भावना पैदा की है, क्योंकि यह पड़ोसी देश की राजधानी के नाम से मिलता-जुलता है, विजेंद्र सिंह ने कहा, “इस नाम को लेकर ग्रामीणों में कभी भी असुरक्षा की भावना नहीं आई और हमारे दिमाग में भी ऐसा विचार कभी नहीं आया, गांव का यह नाम बना रहेगा. सिंह ने यह भी बताया कि गांव के बुजुर्गों ने कभी गांव का नाम बदलने के बारे में नहीं सोचा था और न ही इस संबंध में कभी कोई आवेदन दिया गया. ग्राम प्रधान सर्वेश देवी (46) कहती हैं, ’’गांव के जो युवा जिला मुख्यालय या किसी अन्य स्थान पर काम के लिए जाते हैं, उन्हें कभी भी गांव के नाम को लेकर किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा.’’
शांति और सदभाव के साथ रहती हैं यहां की हिंदू और मुस्लिम आबादी
“गांव में चौहान, प्रजापति और मुस्लिम समुदाय के लोग पूरी शांति और सदभाव के साथ रहते हैं. गांव में मुसलमानों की आबादी 300-400 के आसपास है. इस्लामाबाद गांव के ही रहने वाले एक अधिवक्ता 28 वर्षीय आदित्य प्रजापति ने कहते हैं, ’’हमने कभी भी ’इस्लामाबाद’ के नाम के बारे में अपने दिमाग में किसी भी तरह की हीन भावना नहीं आने दी और न ही ऐसा कुछ सोचा. बिजनौर जिले के निवासी और दिल्ली में एक बड़े न्यूज चैनल में पत्रकार ताहिर कामरान इस बारे में कहते हैं कि, "नाम तो नाम है. एक जैसे नाम वाले कई लोग और स्थान होते हैं; इससे भला किसी को क्या परेशानी हो सकती है. जहां तक नाम बदलने की बात है तो यह विशुद्ध रूप से एक सियासी हथकंडा है, इसमें नाम बदले जाने वाले स्थान विशेष के अवाम का कोई रोल नहीं होता है. भले ही सरकारें जगहों के नाम बदलती रहें लेकिन लोगों के दिलों से उस नाम को नहीं निकाल पाएगी. सरकार सिर्फ बोर्ड, होर्डिंग्स और दफ्तरी कागजों में नाम बदल सकती है. पुराने नाम से ही लोग अपनी पहचान किसी को बताना पसंद करते हैं.’’
अभी तक सियासी एजेंडे में शामिल नहीं हुआ है इस गांव का नाम
भाजपा के मौजूदा विधायक और बरहापुर विधानसभा क्षेत्र से पार्टी के उम्मीदवार कुंवर सुशांत कुमार सिंह बताया कि गांव के नाम को लेकर कोई समस्या नहीं है. नाम बदलने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस संबंध में कुछ भी चुनाव के बाद किया जाएगा. बरहापुर से सपा प्रत्याशी कपिल कुमार ने कहा कि इस्लामाबाद के नाम से कभी डर और चिंता की भावना पैदा नहीं हुई और न ही कोई हीन भावना पैदा हुई है. गांव के लोगों ने भी कभी इस नाम को बदलने की मांग नहीं की है”. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सात चरणों में 10 फरवरी से 7 मार्च के बीच होंगे और नतीजे 10 मार्च को घोषित किए जाएंगे.
इस आधार पर वोट करेंगे गांव के मतदाता
गांव के लोगों का कृषि मुख्य पेशा है. यहां के किसान गन्ना, गेहूं, धान और मूंगफली सहित अन्य फसलें उगाते हैं. प्रधान के पति विजेंद्र सिंह सिंह, जो भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के पदाधिकारी भी हैं, ने कहा कि तीन कृषि कानूनों के विरोध में यहां के लोग विरोध करने प्रदर्शन में गए थे और विरोध करने वाले किसानों को समर्थन दिया था. चुनाव के सवाल पर वह कहते हैं, ’’यहां चुनाव में मुकाबला भाजपा, सपा और बसपा के बीच है. गांव के लोग विकास के लिए वोट करेंगे. गांव के मुख्य सड़कों की हालत ठीक है, लेकिन गांव के अंदर कच्चे रास्ते हैं उन्हें पक्का बनाने की जरूरत है. गांव में लड़कियों की पढ़ाई के लिए इंटर कॉलेज की जरूरत है.’’
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