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शोएब रज़ा: ईद-उल-अजहा यानि कुर्बानी की ईद. खुशीयों का दिन, कुर्बानी का दिन, गरीबों का ख्याल रखने का दिन. इस्लाम को मानने वाले यानि मुसलमानों के लिए ये त्योहार बेहद खास है. कई लोग ईद उल अज़हा को ईद-ए-कुर्बां भी कहते हैं जिसका मतलब है. मतलब कुर्बानी के मौके पर अल्लाह इंसान के बहुत करीब होता है. कुर्बानी उस जानवर के ज़िबह करने को कहते हैं, जिसे 10, 11, 12 ज़िलहिज्जा यानि हज के महीने में खुदा को खुश करने के लिए ज़िबह किया जाता है. कुरान में लिखा है - हमने तुम्हें हौज-ए-कौसा दिया, तो तुम अपने अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ो और कुर्बानी करो.
क्यों की जाती है कुर्बानी?
इस्लाम में कहा गया है, कि दुनिया में 1 लाख 24 हजार पैगंबर (नबी, Prophet) आए. जिन्होंने अल्लाह के हुक्म को माना और इस्लाम की दावत दी. हज़रत मौहम्मद साहब इस्लाम के आखिरी पैगंबर थे. उनके बाद नबुव्वत का दौर खत्म हो गया. इन्हीं पैगम्बरों मे से एक पैगंबर हज़रत इब्राहीम दुनिया में आए, जिनकी सुन्नत को बकरीद मनाकर जिंदा रखा जाता है. कुरान में आता है, कि अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम को ख्वाब में अपनी सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का हुक्म दिया. उस वक्त हज़रत इब्राहिम को 80 साल की उम्र में औलाद पैदा हुई थी. हज़रत इब्राहीम के बेटे का नाम इस्माइल था. वो हज़रत इब्राहीम के लिए सबसे प्यारे थे. अल्लाह का हुक्म पूरा करने के लिए हज़रत इब्राहीम ने सख्त इम्तिहान दिया.
हज़रत इब्राहीम को जहां एक तरफ अल्लाह का हुक्म पूरा करना था, वहीं दूसरी जानिब बेटे की मुहब्बत उन्हें ये करने से रोक रही थी लेकिन उन्होंने अल्लाह के हुक्म पर अमल किया और बेटे को अल्लाह के रास्ते में कुर्बान करने के लिए आगे आ गए. हज़रत इब्राहिम ने जब कुर्बानी पेश करने लगे तो उन्हें लगा कि उनके ज़ज्बात बीच में आ सकते हैं. इस वजह से उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध कर कुर्बानी पेश की थी. इसके बाद जब उन्होंने अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो बेटे इस्माइल को सही सलामत पाया और देखा कि अल्लाह के हुक्म से कटा हुआ दुम्बा (भेड़ जैसा दिखने वाला जानवर) पड़ा है. यहीं से ईल उल अज़हा की शुरूआत हुई और सभी मुसलमान हज़रत इब्राहीम की इस सुन्नत को ज़िंदा रखने के लिए अल्लाह की राह में कुर्बानी पेश करते हैं.
गरीबों में बांटा जाता है कुर्बानी का गोश्त
बकरीद का दिन फर्ज-ए-कुर्बानी का दिन होता है. इस्लाम में मुसलमानों और गरीबों का खास ध्यान रखने को खास तौर पर कहा गया है. इस वजह से बकरीद पर गरीबों का खास ख्याल रखा जाता है. इस दिन कुर्बानी के बाद गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं. इन तीन हिस्सों में खुद के लिए एक हिस्सा रखा जाता है, एक हिस्सा पड़ोसियों और रिश्तेदारों को बांटा जाता है और एक हिस्सा गरीब-ज़रूरतमंदों को बांट दिया जाता है. इसके ज़रिए मुस्लिम लोग पैगाम देते हैं कि वो अपने दिल की करीब चीज भी दूसरों की बेहतरी के लिए अल्लाह की राह में कुर्बान कर देते हैं.
इस साल ईद उल अज़हा पर दिख रहा है कोरोना का असर
इस साल कोरोना वायरस के चलते हर त्योहार पर खासा असर पड़ा है और ईद उल अज़हा पर भी इसका असर साफ दिख रहा है. इस बार कही भी बकरों की मंडी नहीं लगी और लोगों ने बकरे या तो ऑनलाइन खरीदे या फिर गली मुहल्लों से. इसके अलावा बड़ी-बड़ी मुस्लिम तंज़ीमों ने भी मुसलमानों से अपील की है कि हुकूमत के ज़रिए जारी की गई गाइंडलाइंस के मुताबिक ईद उल अज़हा को त्योहार मनाएं.