यूं तो दास्ताने अनारकली बहुत पुरानी है, इसकी शुरूआत 1922 में तब से हो गई थी जब उर्दू के एक बहुत मकबूल मुसन्निफ इम्तियाज़ अली ताज ने इस मौज़ू पर एक नाटक लिखा और इस नाटक को स्टेज पर लाने की कोशिश की थी.
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मोहम्मद सुहेल : हिंदी फिल्मी जगत की सबसे कामयाब फिल्म मुग़ले आज़म 5 अगस्त यानी आज ही के दिन रिलीज़ हुई थी. के आसिफ साहब की शानदार हिदायतकारी, शकील बायूंनी के बेहतरीन नग़मे, नौशाद की बेमिसाल धुनें और ज़ीनत अमान के वालिद अमानुल्ला खान, अहसान रिज़वी, कमाल अमरोहवी के रोबदार डॉयलाग आज भी बहुत लोगों में बहुत मकबूल हैं.
यूं तो दास्ताने अनारकली बहुत पुरानी है, इसकी शुरूआत 1922 में तब से हो गई थी जब उर्दू के एक बहुत मकबूल मुसन्निफ इम्तियाज़ अली ताज ने इस मौज़ू पर एक नाटक लिखा और इस नाटक को स्टेज पर लाने की कोशिश की थी. चूंकि यह कहानी मुगलई सलतनत को ललकारती एक कनीज़ की कहानी है तो ज़ाहिर है कि इसमें शाही लिबास, शाही महल और शाही बोल-चाल के सबब होना लाज़मी से बात है लेकिन ये सब नाटक शक्ल में कामयाबी हासिल नहीं कर पाया और अवाम ने इसे खारिज कर दिया. बाद में भी इस मौज़ू पर कई बार फिल्म बनाने की कोशिश की गई लेकिन यह तब भी कामयाबी के परवान नहीं चढ़ पाई.
साल 1946 में के-आसिफ ने इसको बड़े पर्दे पर उतारने के बारे में सोचा लेकिन यह एक ऐसी कहानी थी जिस पर करोड़ों रुपये खर्च होने थे. इसके लिए के आसिफ को एक फाइनांसर शिराज अली हकीम मिले, जो उस वक्त की एक बहुत बड़ी और अमीर हस्ती हुआ करते थे, वो इस फिल्म पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो गए.
आप सुनकर तअज्जुब करेंगे कि अनारकली का किरदार नरगिस को मिला था, इसके अलावा सपरू और चंद्र मोहन इसमें दीगर किरदारों के लिए मुंतखब हुए थे और तकरीबन इस फिल्म की 8 रील बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियो में शूट भी हो चुकी थी लेकिन बदकिस्मती रही के-आसिफ साहब कि 1947 में हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया और शिराज साहब, जोकि पाकिस्तान के बानी मोहम्मद अली जिन्ना के बेहद खास लोगों में से थे, वो पाकिस्तान चले गए और इसी दौरान चंद्र मोहन का भी इंतेकाल हो गया था, जिसके बाद फिल्म बंद हो गई.
लेकिन जुनूनी के-आसिफ साहब कहां मानने वाले थे, उन्होंने एक बार फिर से फिल्म का आगाज़ करने की कोशिश की और एक बेहद अमीर शख्स शापूर जी पालोंजी से मुलाताक हुई और वो इस कहानी से काफी मुतास्सिर हुए, जिसके बाद वो इस फिल्म पर पैसा लगाने के लिए तैयार हो गए. हालांकि शापूर जी बीच-बीज में के-आसिफ को इस बात के लिए बार-बार टोकते रहते कि बजट बहुत ज़्यादा हो गया है. उनके इस तबसिरे पर के-आसिफ ने कहा था कि लाखों लगाओगो तो लाखों पाओगे और करोड़ों लगाओगे तो करोड़ों पाओगो. के-आसिफ के इस जवाब पर शापूर जी मान जाया करते थे. तमाम कोशिशों और सालों की मेहनत के बाद जब फिल्म तैयार होकर रिलीज़ हुई तो इसने पिछले तमाम रिकॉर्ड को तोड़ दिया. कहा यह भी जाता है कि लोग इस फिल्म की टिकट खरीदने के लिए सिनेमा हॉल के बाहर लोगों ने बिस्तर तक लगा लिए थे.
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