)
भारत में शादी को एक जन्म-जन्मान्तर का रिश्ता माना जाता है, जिसे कोई अदृश्य ताकत पहले से तय कर रखा होता है. इसे सिर्फ एक शारीरिक सुख या सिर्फ संतानोत्पत्ति का साधन नहीं माना जाता है, बल्कि ये एक सामाजिक संस्कार है, जिसका पालन करने वाली औरत या मर्द अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है. यही वजह है कि बहुत से धार्मिक कर्मकांडों में सिर्फ विवाहित महिलाएं ही हिस्सा ले सकती हैं. विवाह स्त्रियों को सम्मान और सामाजिक सुरक्षा भी देता है, शायद इसलिए शादी को एक पवित्र रिश्ता माना जाता है. इस्लाम में इसे जहाँ एक समझौता बताया गया है, वहीँ यहाँ औरतों को दूसरे मजहब और समाज से कहीं ज्यादा अधिकार और इज्जात बख्शा गया है, लेकिन हज़ारों घर- परिवार में यही रिश्ता रोज़ एक ख़ामोश डर की छतरी तले घुट-घुटकर जीता है. यह डर सिर्फ़ मारपीट का नहीं होता बल्कि उस एक शब्द का होता है, जिसे इस सभ्य समाज ने 'तलाक' का नाम दिया है.
महिलाओं के हक़ में कानून बनने और उनके अधिकार तय होने के बावजूद आज भी बहुत-सी शादीशुदा महिलाएँ इसी डर में सांस लेती हैं कि अगर उन्होंने सवाल किया,अपनी बात रखी या असहमति जताई, तो शादी जैसा पवित्र रिश्ते से उन्हें हाथ धोना पड़ जाएगा.ये डर किसी और का नहीं बल्कि उसी हमसफ़र और जन्म-जन्मान्तर के साथी का होता है, जो हर हाल में साथ निभाने का वादा कर उसे अपने घर लाया होता है.
भारत में मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक़ को अपराध घोषित किया जा चुका है, और अन्य कानूनों में भी महिलाओं के अधिकार तय हैं, लेकिन सवाल यह है कि
क्या कानून बनने के बाद महिलाओं का डर खत्म हो गया?
हक़ीक़त इससे ठीक विपरीत हैं. कानून काग़ज़ पर मज़बूत है, लेकिन घर की चार दीवारों के भीतर आज भी बहुत-सी महिलाएँ उस एक तलाक़ शब्द से कांप जाती हैं. समाज, बदनामी, बच्चों का भविष्य और मायके का दबाव- ये सब मिलकर उस डर को और गहरा कर देते हैं.
घरेलू हिंसा: जो दिखती नहीं, पर रोज़ मारती है
घरेलू हिंसा को हम अक्सर नीले निशान, सूजे चेहरे और अस्पताल की तस्वीरों से जोड़ते हैं,लेकिन इसकी सबसे खतरनाक शक्ल वह होती है जो दिखती नहीं है, लेकिन थोडा - थोडा सभी महिलाओं के हिस्से में आ जाती हैं, वो हैं-मानसिक हिंसा.जब किसी औरत को बार-बार यह याद दिलाया जाए कि वह कभी भी छोड़ी जा सकती है. जब तलाक़ को उसकी ज़िंदगी पर नियंत्रण रखने का ज़रिया बना दिया जाए, तब हिंसा सिर्फ़ हाथों से नहीं, शब्दों से भी होती है.
रोज़ी: मायके जाने की चाह की सज़ा
रोज़ी की कहानी बहुत साधारण-सी है,लेकिन डरावनी भी है. वह बस अपने मायके जाना चाहती थी. यह एक बेटी की सामान्य इच्छा होती है, कोई गुनाह नहीं होता, लेकिन उसके पति ने उसके मायके जाने की इच्छा को अपनी इज़्ज़त से जोड़ लिया. बात बढ़ी, आवाज़ें ऊँची हुईं, और फिर वह पल आया जब रोज़ी ने पहली बार महसूस किया कि यह घर अब उसके लिए सुरक्षित नहीं है.
एक झगड़े के दौरान उसके पति ने उस पर हाथ उठा दिया. थप्पड़ों की आवाज़ उसके कानों में देर तक गूँजती रही. जमीन पर पड़ी, रोती हुई रोज़ी से उसने कहा, "तलाक़ दूँगा तुझे. अपने मायके चली जा."
उस दिन रोज़ी का डर सिर्फ़ दर्द का नहीं था, बल्कि उस अकेलेपन का था जो तलाक़ के बाद समाज देता है. उसी डर ने उसे चुप करा दिया. आज वह अपने मायके जाने से पहले सौ बार सोचती है- कहीं यह उसकी आख़िरी ‘इजाज़त’ तो नहीं.
अस्मा : अपनी राय रखने की कीमत
अस्मा ने गलती सिर्फ़ इतनी की कि उसने अपनी बात रखी थी. घर के खर्चों और कामों को लेकर उसने बराबरी की बात की थी, लेकिन उसके पति को यह पसंद नहीं आया. उसे लगा कि उसकी ताक़त को चुनौती दी जा रही है. वह असुरक्षित हो गयी, और फिर उसने वही तरीका अपनाया जो सबसे आसान था—डर.
बहुत ज़्यादा बोलोगी, तो तलाक़ दे दूँगा.
यह वाक्य अस्मा के लिए किसी परमाणु हमले से कम नहीं था. उसने उस दिन समझ लिया कि यहाँ उसकी आवाज़ की कीमत तलाक़ की धमकी है. धीरे-धीरे उसने चुप रहना सीख लिया, अपने सवाल निगलने सीख लिए.
कानून बदल गया, हालात क्यों नहीं?
भारत में तलाक़ और घरेलू हिंसा को लेकर क़ानून मौजूद हैं. तीन तलाक़ पर सख़्त प्रावधान हैं.शिकायत के रास्ते खुले हैं.फिर भी महिलाएँ डरती हैं, क्योंकि कानून अदालत में साथ देता है,समाज घर के भीतर नहीं.
मायके की चिंता, बच्चों का भविष्य, बदनामी का डर—ये सब मिलकर औरत को मजबूर कर देते हैं कि वह सब सह ले. जब एक औरत डर के साथ जीती है, तो सिर्फ़ वह नहीं टूटती—एक पूरा परिवार टूटता है. बच्चे वही भाषा सीखते हैं, वही डर अपनाते हैं.घरेलू हिंसा की यह चुप्पी आने वाली पीढ़ियों को झकझोर देती है.
रोज़ी और आस्मा किसी एक घर की कहानी नहीं हैं. वे उन हज़ारों महिलाओं का चेहरा हैं, जिनके लिए तलाक़ आज भी एक शब्द नहीं, एक भयानक खौफ का साया है. कानून बन गया है, लेकिन ज़रूरत अब समाज की सोच बदलने की है.
तलाक़ डराने का हथियार नहीं होना चाहिए. रिश्ता डर से नहीं, इज़्ज़त से चलना चाहिए. जब तक यह बदलाव नहीं आएगा, तब तक घरेलू हिंसा की यह ख़ामोश आवाज़ यूँ ही गूँजती रहेगी.