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Opinion: फ़ेमिनिज़्म बग़ावत नहीं है,ये वो खामोश पुकार है जो सदियों से दबाई जाती रही है

Opinion: फ़ेमिनिज़्म एक वैचारिक आन्दोलन है,जो महिलाओं के लिए बिना किसी लैंगिक भेदभाव के सामान पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अवसरों की मांग करता है. लेकिन बड़ी चालाकी से फ़ेमिनिज़्म को महिला विद्रोह का नाम देकर इस आन्दोलन को कमज़ोर करने और इसकी छवि को खराब करने की भी कोशिश जारी है. इरम खान बता रही हैं कि आखिर एक पितृसत्तात्मक समाज से महिलाएं क्या और कितने की उम्मीद रखती हैं?      

Opinion: फ़ेमिनिज़्म बग़ावत नहीं है,ये वो खामोश पुकार है जो सदियों से दबाई जाती रही है

हिंदुस्तान में औरतों के हालात बदल रहे हैं. उनके हुकूक और हिस्सेदारी बदल रही है. क्या ये एक साबित सत्य है या सवाल ? कहा जाता है की समाज में औरतों को बराबरी पर लाने के लिए कई बदलाव किए जा रहे हैं, और इस अमल को 'फ़ेमिनिज़्म' का नाम दिया गया है. लेकिन फ़ेमिनिज़्म आखिर है क्या है ? क्या हमारा ये समाज फ़ेमिनिज़्म की परिभाषा को समझ पाया है,और अगर समझ भी गया है, तो क्या उसके अंदर इसे बर्दाश्त करने की क्षमता पैदा हुई है? 

आज की दुनिया में जब भी फ़ेमिनिज़्म का नाम लिया जाता है, तो कई लोगों के ज़हन में एक अजीब-सी तस्वीर उभरती है. सड़क पर नारे लगाती, हाथों में पोस्टर उठाए, ग़ुस्से में तमतमाई हुई औरतें. समाज का एक बड़ा हिस्सा इस तस्वीर को ही फ़ेमिनिज़्म समझ लेता है, और फिर कहता है कि औरतें बराबरी के नाम पर हदें, मर्यादाएं पार कर  रही हैं.

इसके लिए सिर्फ मर्दों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है.कुछ खबरें आपके सामने से भी गुज़री होंगी जैसे लखनऊ के शहीद पथ पर एक लड़की नशे में धुत कैसे एक गाड़ी से अर्धनग्न होकर बाहर लटकती रही. मुंबई में कुछ लड़कियों ने नशे में धुत होकर गाड़ी पर चढ कर रील बनाई, तो क्या ये आज़ादी है ? क्या ये फ़ेमिनिज़्म है जिसकी सदियों से मांग की जा रही है, जिसके लिए महिलाएं लड़ रही हैं, संघर्ष कर रही हैं ? 

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मेरे नज़दीक हमेशा इस सवाल का जवाब है "नहीं" होगा. 

हक़ीक़त यह है कि फ़ेमिनिज़्म का मक़सद शोर नहीं, बल्की ख़ामोशी से क़बूल किए जाने वाले बराबरी के पैमाने हैं, जो मर्द और औरतों के लिए कामयाबी की परिभाषा को अलग-अलग न समझने पर जोर देता है. दोनों के लिए सामान मानक तय करता है. 

बराबरी का मतलब यह हरगिज़ नहीं कि औरतें मर्दों से किसी मुकाबले में उतर कर लड़ाई करें, या टकराव को ही अपनी पहचान बना लें. बराबरी का मतलब है सामान अवसर से है. 

मौक़ा सीखने का, बढ़ने का, कमाने का, और ख़्वाब देखने का और उन्हें सच करने का है. 

मौक़ा बिना रुकावट, बिना ताना सुने, बिना “यह औरतों का काम नहीं” कहे हुए जीने का है. 

और सबसे अहम—मौक़ा यह साबित करने का कि क़ाबिलियत किसी जेंडर की मोहताज नहीं होती है. 

लेकिन अफ़सोस यह है कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी फ़ेमिनिज़्म को ग़लत समझता है या उसके बारे में राय रखता है. जब कहीं कुछ औरतें बराबरी के नाम पर ग़लत तरीक़े अपनाती हैं, तो पूरा समाज इस एक तस्वीर से फ़ैसला सुना देता है कि देखा, यही है फ़ेमिनिज़्म!
मगर कोई यह नहीं पूछता कि असल फ़ेमिनिज़्म क्या कहता है, क्या चाहता है, क्या मांगता है?

असल फ़ेमिनिज़्म कहता है—
बराबरी आवाज़ ऊँची करने से नहीं मिलती,
बराबरी सोच ऊँची करने से मिलती है.

और इसी सोच के ऊँचे होने की सबसे बड़ी मिसाल है सिर्फ़ बराबर हक़ की नहीं, बल्कि जेहनी तौर पर भी औरतों को मर्दों के बराबर समझने की है.
Cerebral opportunity — यानी मानसिक, बौद्धिक, पेशेवर और सामाजिक मौक़ों तक महिला और पुरुषों की सामान पहुंच. 

आज भी दफ्तरों में, घरों में, फैसलों में और करियर में—औरतों को मर्दों की तरह मौके नहीं मिलते. ज़्यादातर जगहों पर औरत की काबिलियत को उसके जेंडर की पैमाइश में तौला जाता है. तो फिर सवाल उठता है:
जब सफलता की दौड़ एक ही ट्रैक पर नहीं दौड़ाई जा रही, तो जीत की उम्मीद में फर्क क्यों?

बराबरी का मतलब यह कभी नहीं रहा कि औरतें किसी से लड़ना चाहती हैं.
बल्कि असल सवाल यह है कि जब क़ाबिलियत और ईमानदारी औरत-मर्द में बराबर है, तो मौक़े में फर्क क्यों?

फ़ेमिनिज़्म शोर नहीं, शऊर है.
यह दीवारें गिराने की मांग नहीं करता,
यह बस दरवाज़े खोलने की गुज़ारिश करता है.
यह नफ़रत नहीं सिखाता,
यह इंसाफ़ सिखाता है.

और सच तो यह है कि जब समाज औरतों को बराबरी देता है, तो वो किसी एहसान का बोझ नहीं उठाते,बल्कि समाज अपने ही दामन में सभ्यता,तरक़्क़ी और इंसाफ़ का फूल खिलाता है. इस दौर की अजीब-सी बात है—हम बराबरी की बातें तो करते हैं, मगर बराबरी को समझने की कोशिश नहीं करते. जब मर्द किसी कंपनी का सीईओ बने. जब उसका प्रमोशन हो तो क्या उससे उसके पीछे की गई जद्दोजहद की कहानी साबित करवाई जाती है, क्या उससे पूछा जाता है कि उसने अपने पति,पिता या बेटे होने के फराईज़ को कितना बेहतर निभाया है? वहीं जब एक औरत ये सब मवाके कमाती है तो उससे पहला सवाल किया जाता है कि वो अपनी निजी ज़िंदगी में कितनी कामयाब है? क्या उसने शादी की है? क्या वो परिवार की देखभाल करती है? क्या वो बड़े शहर में अकेले रहती है? क्या उसके सिनियर्स के साथ अच्छे ताल्लुकात हैं ? क्या उसने अपने ससुराल के फर्ज़ निभाए हैं? क्या वो अपने बच्चों का ख्याल कर पाई हैं? 

फ़ेमिनिज़्म का मानी है की समाज ये समझे कि आज अगर कोई औरत आगे बढ़ती है, कामयाबी हासिल करती है, तो इसमें उसका हक़ है—कोई तोहफ़ा नहीं.
फिर लोग यह सवाल क्यों करते हैं:“औरतों को इतना सब क्यूँ चाहिए?” कभी यह क्यों नहीं पूछते: “मौके पहले कम क्यूँ दिए गए?”

फ़ेमिनिज़्म यही तो पूछता है.
बराबरी की ये जंग हाथों में पत्थर लेकर नहीं लड़ी जाती,
ये लड़ाई दिमाग़,इरादे और तमीज़ से जीती जाती है.

और शायद यही वजह है कि आज की सबसे समझदार आवाज़ यह कहती है—
“बराबरी मर्द और औरत के बीच नहीं,
बराबरी मौक़ों और हक़ों के बीच होनी चाहिए.”

असल हक़ीक़त यह है कि फ़ेमिनिज़्म की शुरुआत ग़ुस्से से नहीं, घुटन से हुई थी.
वो घुटन जिसे सदियों से औरतों ने महसूस किया—
इजाज़त मांगते हुए,
खुद को साबित करते हुए,
और बार-बार ये सुनते हुए कि “ये तुम्हारा काम नहीं.”

फ़ेमिनिज़्म बग़ावत नहीं है,
ये वो खामोश पुकार है जो सदियों से दबाई जाती रही.
ये वो हक़ की तलब है जिसे किसी आवाज़ की ऊँचाई नहीं, बल्कि किसी सोच की ऊँचाई चाहिए.

फ़ेमिनिज़्म बग़ावत नहीं है,ये वो खामोश पुकार है जो सदियों से दबाई जाती रही है 

 

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Eram Khan

इरम खान पिछले पांच सालों से Zee समूह के सलाम टीवी चैनल के साथ बतौर एंकर और रिपोर्टर जुड़ी हुई हैं. उन्होंने दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के अ...और पढ़ें

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