राहत को चुकानी पड़ी थी अपनी बेबाकी की कीमत, बरसों तक नहीं मिली थी लालकिला मुशायरे की दावत

कई बरसों के बाद जब दिल्ली में हुकूमत बदली और दिल्ली उर्दू अकादमी में नए वाइस चेयरमैन माजिद देवबंदी आए तो उन्होंने राहत इंदौरी को लाल किले के मुशायरे में आने की दावत दी. 

राहत को चुकानी पड़ी थी अपनी बेबाकी की कीमत, बरसों तक नहीं मिली थी लालकिला मुशायरे की दावत
फाइल फोटो

नई दिल्ली: "साथ चलना है तो तलवार उठा मेरी तरह, मुझसे बुज़दिल की हिमायत नहीं होने वाली" ये बहादुरी.. अल्फाज़ के जादूगर, शायरी के शहंशाह राहत इंदौरी की थी. जो हुकूमत की आंखों में आंखे डालकर बात करते थे, जो कहना था, वो सामने कहते थे, और जो बात कह दी उससे कभी पीछे नहीं हटते थे. राहत इंदौरी को कई बार इसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ी, लेकिन शायरी के उसूलों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. हर साल 26 जनवरी के मौके पर दिल्ली के लाल किले के मैदान में तारीख़ी मुशायरा होता है. मुल्क का हर बड़े शायर को इसमें दावत दी जाती है. इस मुशायरे में हर साल राहत इंदौरी को भी बुलाया जाता था लेकिन 2014 से पहले कई सालों तक उन्हें इस मुशायरें में आने की दावत नहीं दी गई. इसकी वजह थी, उनकी हुकूमत की आंखों में आंखे डालकर बात करनी की आदत. 

दरअसल लाल किले पर होने वाला मुशायरा दिल्ली उर्दू अकादमी मुनअकिद कराती है, जो दिल्ली हुकूमत के तहत काम करती है. ऐसे में जब राहत इंदौरी ने लाल किले पर शेर पढ़ने शुरू किए तो बातों ही बातों में हुकूमत पर तंज़ कस दिए. ये बात एक बड़े लीडर को बुरी लग गई और अगले कई बरसों तक राहत इंदौरी को लाल किले के तारीख़ी मुशायरे में दावत नहीं दी गई. हालांकि राहत इंदौरी की शायरी पर इस सबसे ना तो कोई फर्क पड़ने वाला था और ना ही पड़ा.

कई साल के बाद जब दिल्ली उर्दू एकेडमी में ओहदे दारों में बदलाव हुआ तो फिर उन्हें इस मुशायरे की दीवत मिली और राहत इंदौरी ने दावत कबूल की. राहत साहब अपने उसी अंदाज़ में मुशायरे में शिरकत की जो 10 साल पहले थी. दिल्ली उर्दू एकेडमी के साबिक नायब सद्र माजिद देवबंदी मुशायरे वाली शाम को याद करते हुए कहते हैं, कि राहत इंदौरी ने स्टेज पर माइक संभालते ही ज़िक्र किया कि वो "एक बनवास काटकर फिर से लाल क़िले पर मुशायरें में पहुंचे हैं." माजिद याद करते हैं कि राहत इंदौरी की शायरी उस दिन भी हुकूमत की आंखों में आंखें डालकर बात कर रही थी. उन्हें कभी भी अपनी बात को कहने में हिचक नहीं थी, ये ही एक बहादुर शायर की पहचान होती है.

हालांकि 2015 के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ जब दिल्ली उर्दू अकादमी की जानिब से कोई बड़ा मुशायरा हुआ और उसमें राहत इंदौरी की मौजूदगी ना रही हो. दिल्ली उर्दू अकादमी की जानिब से क्नॉट पैलेस नें होने वाले हर साल के प्रोग्राम में भी लगातार राहत इंदौरी आते रहे. यहां राहत इंदौरी की शायरी पर नौवजानों को झूमता देख एक अलग ही एहसास होता था.

दिल्ली उर्दू अकादमी के साबिक नायब सदर प्रोफेसर शहपर रसूल कहते हैं कि उन्होंने हमेशा राहत इंदौरी को दिल्ली उर्दू एकेडमी के मुशायरों में दावत दी ह, क्योंकि उनकी मौजूदगी ही मुशायरों के कामयाब होने की सनद होती थी. ऐसे में कई बरस तक लाल किले के मुशायरों में राहत साहब को ना बुलाए जाने की बात समझ नहीं आती.

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