"हां भाई बना दो हमारी तस्वीर, क्योंकि हम रुख्सत होने वाले हैं..."

...उस वक्त मैंने वहां पर मौजूद एक फोटोग्राफर से कहा कि अरे भाई हमारी खुशनसीबी है कि हम राहत साहब के पास बैठे हैं, तो हमारी एक तस्वीर ही बना दो.

"हां भाई बना दो हमारी तस्वीर, क्योंकि हम रुख्सत होने वाले हैं..."
फाइल फोटो.

नई दिल्ली: आलमी शोहरत याफ्ता शायर राहत इंदौरी का मंगल की शाम 5 बजे दिल का दौरा पड़ने से इंतेकाल हो गया. मंगल की सुबह उन्होंने ट्वीट करके जानकारी दी थी कि उनकी रिपोर्ट कोरना पॉज़िटिव आई है. राहत इंदौरी अपने बेबाक अदांज़ और बेहतरीन शायरी के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं. वो हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी अदबी दुनिया के लिए एक मिसाल रहे हैं. राहत इंदौरी की मौत अदबी दुनिया के लिए कभी न भरने वाला ज़ख्म साबित होगा. अदबी दुनिया में उनकी कमी का ऐहसास इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके इंतेकाल की खबर के बाद से उनके साथी शायरों में एक संजीदा माहौल कायम लिया है.

मारूफ शायर नवाज़ देवबंदी ने ज़ी मीडिया से गुफ्तगू करते हुए बताया कि उनके इंतेकाल से अदबी दुनिया को ना काबिले तिलाफी नुक़सान हुआ है. उन्होंने गुज़िश्ता बरस की एक मुलाकात का ज़िक्र करते हुए बताया कि राहत साहब और मैं एक मुशायरे में शिरकत के लिए दुबई गए हुए थे. वहां पर हम एक ही सौफे पर बैठे थे. उस वक्त मैंने वहां पर मौजूद एक फोटोग्राफर से कहा कि अरे भाई हमारी खुशनसीबी है कि हम राहत साहब के पास बैठे हैं, तो हमारी एक तस्वीर ही बना दो. जिसके बाद राहत साहब ने एक ऐसा जवाब दिया जिसे याद करके मैं आज जज्बाती हो उठता हूं. राहत साहब ने कहा था,"हां भाई बना दो, नवाज़ भाई के साथ हमारी एक तस्वीर, क्योंकि हम रुख्सत होने वाले हैं. इसलिए नवाज़ भाई भी यह चाह रहे हैं कि राहत के साथ आखिरी तस्वीर बना ली जाए." राहत साहब के इन अल्फाज़ को सुनकर मैंने कहा कि नहीं... नहीं... राहत भाई ये कैसी बात कर रहे हैं आप.... खैर कहने का मकसद यह है कि बड़े लोग जब मज़ाक करते हैं तो कितनी संजीदा तरीके से करते हैं, जिसका अंदाज़ा मुझे अब हो रहा है. 

इसी तरह नामवर नाज़िमे मुशायरा मुईन शादाब ने ज़ी मीडिया से गुफ्तगू में बताया कि राहत इंदौरी साहब अपने से छोटे शायरों को बहुत सपोर्ट किया करते थे और मेरी कामयाबी के पीछे भी कहीं न कहीं राहत साहब का ही हाथ रहा है. उन्होंने अपना खुद का एक वाक्या साझा करते हुए कहा कि मैं मुरादाबाद के एक मुशायरे की निज़ामत कर रहा था. वो मेरा शुरूआती दौर था. उस मुशायरे में हज़ारों की तदादा में लोग मौजूद थे. राहत साहब क्योंकि एक अज़ीम शायर थे और मुशायरों की रिवायत के मुताबिक बड़े शायरों को बाद में ही पढ़ने का मौका दिया जाता है लेकिन वहां बैठे सामईन ने उनका नंबर आने से पहले ही शोर-शराबा शुरू कर दिया और राहत साहब को माइक पर बुलाने की मांग करने लगे थे. ये शोर शराबा करीब 3-4 मिनट तक चलता रहा, मैंने सामईन को खामोश करने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं समझ रहे थे, अपनी ज़िद पर अड़े हुए थे. जिसके बाद राहत साहब ने मेरी मदद की और अपनी जगह से उठ कर माइक पर आकर अपने बेमिसाल अंदाज़ में अपने चाहने वालों से मुखातिब हुए और सामईन को खामोश कराया. जिसके बाद मुशायरा आगे बढ़ सका. उनकी एक गुज़ारिश के बाद सामईन बेहद खूबसूरत अंदाज़ में मुशायरे को सुनते रहे.

मुईन शादाब ने मज़ीद बताया कि वो ज़मीन जुड़े हुए शख्स थे. अपने से छोटे कद के शायरों के साथ रहकर उनको कभी यह महसूस नहीं होने देते थे कि वो एक किसी अज़ीम शायर के पास बैठे हैं. उन्होंने कहा राहत साहब का अगर किसी से कोई मसला पेश आजाया करता था तो वो उसको बहुत जल्द हल कर लिया करते थे. यहां तक को वो खुद उस शख्स से पहल के तौर बात कर लिया करते थे, जिसके साथ मसला पेश आया हो, अपनी गलती न होने के बावजूद वो अपने छोटों के साथ पेश आए मसलों को अपनी जानिब से सुलझा लिया करते थे. 

शायरा अना देहलवी ने ज़ी मीडिया से गुफ्तुगू करते हुए बताया कि राहत साहब सिर्फ एक अज़ीम शायर ही नहीं थे बल्कि वो एक अज़ीम इंसान भी थे. उनकी कई मिसाल पेश की जा सकती हैं. राहत इंदौरी के अंदर प्यार, खुद्दार और बड़कपन कूट-कूट कर भरा हुआ था. राहत साहब की एक खास बात का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि हम कहीं भी मुशायरों में शिरकत के लिए जाया करते थे तो सफर के दौरान कभी कुछ खाने-पीने का सामान खरीदने के बाद जब हम उस सामान की कीमत अदा करने के लिए अपने पर्स में हाथ डालते थे तो वो हमेशा रोक देते थे यहां तक कि डांट भी दिया करते थे और कहते थे कि तुम अभी इतने बड़े नहीं हुए, जब तुम्हारे बड़े-बुज़ुर्ग बैठे हुए हैं तो वहां अपनी जेब में हाथ नहीं डालते. अना देहलवी ने आगे बताया कि यह वाक्या सिर्फ मेरे साथ ही नहीं बल्कि वो हर अपने से छोटे शायर के साथ इसी तरह पेश आया करते थे.