मुआशरे की तस्वीर को ना सिर्फ़ तामीर करें बल्कि इसे ख़ूबसूरत बनाने में भी खुद को लगाएं

वो इस फ़िराक़ में बैठे हैं कि मैं पहल करूं..मैं इस फ़िराक़ में हूं कि वो पहल करे

मुआशरे की तस्वीर को ना सिर्फ़ तामीर करें बल्कि इसे ख़ूबसूरत बनाने में भी खुद को लगाएं

नई दिल्ली/ मुमताज़ : हमारा मुआशरे(समाज) हमें हर ग़लत चीज़ से पाक चाहिए...हर बुरी अलामत से आजॉाद चाहिए मुआशरे (समाज) में हमें बेहतरी चाहिए...मुआशरे में हमें हर ख़ूबसूरत तस्वीर चाहिए...लेकिन इसके लिए पहल और मेहनत कोई और कर ले, हम इस बात पर भी जॉरुर अमल करते हैं...कोई और अमल करें ना करें लेकिन 'मैं ही क्यूं करुं?', इस मनफ़ी सोच पर अमल ज़रुर करते हैं।

इसे एक अफ़साने से समझने की कोशिश करते हैं।एक रियासत थी...उसका एक अज़ीम बादशाह था...उस रियासत में एक वबा (महामारी) फैल गई जिसकी वजह से रोज़ाना की बुनियाद पर सैंकड़ों की तादाद में अमवात (DEMISES) होने लगीं।बादशाह ये जानकर इंतेहाई परेशान हो गए कि मैं कैसे इन अमवात को रोकूं क्योंकि रियासत के तमाम हकीम अपनी तमाम कोशिशें कर चुके थे मगर कोई हल ना मिला।

आख़िरकार बादशाह को एक ऐसा शख़्स मिला जिसने बादशाह को मुतमईन किया कि एक अमल से इन अमवात पर रोक लगाई जा सकती है।बादशाह बेहद ख़ुश हुए।हल ये था कि बादशाह ये एलान करवा दें कि रियासत का हर घर चौदहवीं की रात को रियासत के एक मख़सूस कुएं में एक बाल्टी दूध डाल दे।बादशाह ख़ुश हुए और ये ऐलान करवा दिया।उस रियासत में एक बुज़ुर्ग ख़ातून भी रहती थीं।उन बुज़ुर्ग ख़ातून ने सोचा कि पूरी रियासत तो दूध की बाल्टियां कुंए में डालेगा तो क्यों ना मैं पानी की बाल्टी डाल दूं, किसी को ना तो कुछ मालूम पड़ेगा और ना ही पूरे कुंए में एक बाल्टी दूध की बजाए एक बाल्टी पानी डालने से कोई फ़र्क़ पड़ेगा, काम तो हो ही जाएगा।और ये सोचकर बुज़ुर्ग ख़ातून ने एसा ही किया और एक बाल्टी दूध की बजाए एक बाल्टी पानी कुंए में डाल दिया।

बादशाह फ़िक़्र में शब भर सोए नहीं थे।पूरी रात उन्होने महल के एक कोने से दूसरे कोने तक परेशानी के आलम में टहलते हुए काट दी।सुबह होते ही बादशाह ने अपने वुज़रा को तलब किया और ये जानकर बेहद अफ़सुर्दा और मायूस हुए कि अमवात का सिलसिला तो रियासत में अब भी बदस्तूर जारी है।बादशाह ने कुंए का जायज़ा लिया तो देखा कि कुंए में तो पानी ही पानी ही है। दूध तो था ही नहीं।

दरअसल किसी ने भी दूध की बाल्टी डाली ही नहीं थी। हर शख़्स यही सोच रहा था कि कोई दूसरा डाल देगा हमारे ना दूध की बाल्टी ना डालने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा।यानी कि जैसे उन बुज़ुर्ग ख़ातून ने सोचा,मुआशरे के हर शख़्स ने वैसा ही सोचा और अमवात का सिलसिला चलता रहा.

दरअसल हम भी यही करते हैं अपनी इज्तेमाई कोशिशों को हम एक दूसरे पर डालते रहते हैं और इंतेज़ार करते हैं कि कोई और पहल करेगा।मिसाल के तौर पर बदउनवानी एक बड़ा मसअला है हमारे मुआशरे का लेकिन बदउनवानी क्या सिऱ्फ़ सियासतदां ही करते हैं आम अवाम क्या बदउनवान नहीं है?सफ़ाई है,तालीम है,जराएम हैं,बेशुमार मसअले हैं लेकिन किसी एक हैं।और जब मसअले सबके हैं तो हल भी तो सबको ही करना होगा।बेशक हुकूमतों में कुछ ख़ामियां होती हैं लेकिन बाहैसियत एक क़ौम, बाहैसियत मुल्क के ज़िम्मेदार शहरी ये हमारा भी अव्वल फ़र्ज़ होना लाज़मी है कि हम मुआशरे की तस्वीर को ना सिर्फ़ तामीर करने में बल्कि इसे ख़ूबसूरत बनाने में बजाए किसी और के इंतज़ार के अपने आप को लगाएं तो नताएज किसी मुअज्ज़े से कम ना होंगे...यानी ''मैं ही क्यूं पहल करुं?' से 'मैं ही पहल करुं" पर आमादा होना ही मक़सद हो तो कई बेशक़ीमती मक़ासिद हासिल हो जाएंगे।