मुनफरिद लबो लहजे के मालिक अनवर जलालपुरी के यौमे वफात पर खास

ये कहना भी बेजा नहीं होगा कि अनवर साहब जदीदियत के शायर थे. उनकी जबान उतनी सादा और सस्ता थी कि एक आम इंसान को भी आसानी से समझ में आ जाती थी.

मुनफरिद लबो लहजे के मालिक अनवर जलालपुरी के यौमे वफात पर खास
फाइल फोटो

एक अज़ीम नाज़िम, शायर, अदीब, खतीब और भी कई खुदा दाद सलाहियतों के मालिक अनवर जलालपुरी का आज यानी 2 जनवरी को यौमे वफात है. अपनी आला निज़मात के लिए पहचाने जाने वाले अनवर जलालपुरी एक ज़बरदस्त मुकर्रर थे और नाज़िमे मुशायरा भी. उनकी तकरीरों में कमाल की कशिश होती थी. सुनने वाला खुदबखुद ही उनकी जानिब खिंचा चला आता था. उनकी जुगलगोई का भी कोई जवाब नहीं था. उनका ये शेर देखिए. 

सोच रहा हूं घर आंगन में एक लगाऊं आम का पेड़
खट्टा-खट्टा, मीठा-मीठा यानी तेरे नाम का पेड़

ये कहना भी बेजा नहीं होगा कि अनवर साहब जदीदियत के शायर थे. उनकी जबान उतनी सादा और सस्ता थी कि एक आम इंसान को भी आसानी से समझ में आ जाती थी. जैसे-

दरो दीवार पे सबज़े की हुकूमत है यहां
होगा गालिब का कभी अब तो ये घर मेरा है


दिल कहीं, ज़हन कहीं, जिस्म कहीं, रूह कहीं
आदमी टूट के बिखरा कभी ऐसा तो ना था


सड़कों पे आके वो भी मकासिद में बंट गए
कमरों मे जिन के बीच बड़ा मशविरा रहा


शहरों के शोरो-गुल ने ये समझा दिया हमें
कितना सुकून गांव के कच्चे घरों में था


अनवर साहब हमदिया, नातिया, गजलिया, नजमिया, गीत और नग्में हर सिन्फ में लिखा है. देखिए उनके कुछ हमदिया शेर-
तू मुसव्विर है मेरा और तेरी तस्वीर हूं मैं
मुझ को सर सब्ज़ तेरी ही जागीर हूं मैं


या रब दिले मोमिल की आहों में असर दे दे
बाज़ू-ए मुसलमां को जिबरील के पर दे दे


गजलिया शेर
पहले लोगों में मोहब्बत थी रियाकारी ना थी
हाथ और दिल दोनों मिलते थे रियाकारी ना थी


उस ना उम्मीद शख्स ने यूं ही खुदकुशी
नाखुन की तेज़ धार को खंजर बना लिया


अपने अदबी सफर में 40 सालों के दौरान रियासतों के साथ साथ हिंदुस्तान कब बाहर अमेरिका, कनाडा, पाकिस्तान, सऊदी अरब, दुबई, शारजाह, कवैत समेंत दर्जनों मुल्कों में अपनी दिलकश आवाज और दिलनशी मुकलमों से अवाम के दिलों पर हुकूमत की है. 

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