'जहाँ पहुँच के क़दम डगमगाए हैं सब के', आबिद अदीब के शेर

Siraj Mahi
Oct 12, 2023

जहाँ पहुँच के क़दम डगमगाए हैं सब के... उसी मक़ाम से अब अपना रास्ता होगा

जिन्हें ये फ़िक्र नहीं सर रहे रहे न रहे... वो सच ही कहते हैं जब बोलने पे आते हैं

सफ़र में ऐसे कई मरहले भी आते हैं... हर एक मोड़ पे कुछ लोग छूट जाते हैं

ज़माना मुझ से जुदा हो गया ज़माना हुआ... रहा है अब तो बिछड़ने को मुझ से तू बाक़ी

कभी जो बात कही थी तिरे तअ'ल्लुक़ से... अब उस के भी कई मतलब निकाले जाते हैं

हम से 'आबिद' अपने रहबर को शिकायत ये रही... आँख मूँदे उन के पीछे चलने वाले हम नहीं

शाहराहें दफ़अ'तन शो'ले उगलने लग गईं... घर की जानिब चल पड़ा है शहर घेरा कर तमाम

मैं अपने जिस्म में कुछ इस तरह से बिखरा हूँ... कि ये भी कह नहीं सकता मैं कौन हूँ क्या हूँ

सभी तरह से तआ'रुफ़ तो हो गया उन का... रही है अब तो मुलाक़ात रू-ब-रू बाक़ी

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