'बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो'; अहमद फराज के शेर

Siraj Mahi
Mar 24, 2024


ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें... साक़िया साक़िया सँभाल हमें


ये शहर मेरे लिए अजनबी न था लेकिन... तुम्हारे साथ बदलती गईं फ़ज़ाएँ भी


मेरी ख़ातिर न सही अपनी अना की ख़ातिर... अपने बंदों से तो पिंदार ख़ुदाई ले ले


ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है... यही धुआँ मिरे दीवार ओ दर से निकला था


न तेरा क़ुर्ब न बादा है क्या किया जाए... फिर आज दुख भी ज़ियादा है क्या किया जाए


ज़िंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है... हम ने जैसे भी बसर की तिरा एहसाँ जानाँ


कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो... बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो


अब तिरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आए... और से और हुए दर्द के उनवाँ जानाँ


किस को बिकना था मगर ख़ुश हैं कि इस हीले से... हो गईं अपने ख़रीदार से बातें क्या क्या

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