Ahmad Faraz Poetry: अहमद फराज के शेर; 'ज़िंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है'

Aug 26, 2023

Ahmad Faraz
ये शहर मेरे लिए अजनबी न था लेकिन... तुम्हारे साथ बदलती गईं फ़ज़ाएं भी

Ahmad Faraz
किस को बिकना था मगर ख़ुश हैं कि इस हीले से... हो गईं अपने खरीदार से बातें क्या क्या

Ahmad Faraz
अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा... सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला

Ahmad Faraz
ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है... यही धुआं मिरे दीवार ओ दर से निकला था

Ahmad Faraz
न तेरा क़ुर्ब न बादा है क्या किया जाए... फिर आज दुख भी ज्यादा है क्या किया जाए

Ahmad Faraz
कासिदा हम फक़ीर लोगों का... इक ठिकाना नहीं कि तुझ से कहें

Ahmad Faraz
इक तो हम को अदब आदाब ने प्यासा रक्खा... उस पे महफिल में सुराही ने भी गर्दिश नहीं की

Ahmad Faraz
जिंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है... हम ने जैसे भी बसर की तिरा एहसां जानां

Ahmad Faraz
रात भर हंसते हुए तारों ने उन के आरिज़ भी भिगोए होंगे

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