'चढ़ा हुआ था वो दरिया अगर हमारे लिए'; अहमद महफूज के शेर

Siraj Mahi
Mar 10, 2024


रात हवा तूफ़ानी होगी... साथ रहो आसानी होगी


जाने क्या बात थी अंधेरे में... रौशनी सी रही अंधेरे में


रात सरगोशियाँ भी करती है... कान खोलो कभी अंधेरे में


दामन को ज़रा झटक तो देखो... दुनिया है कुछ और शय नहीं है


तेरी इक बात निकाली थी कि रात... कितने ही बातों के पहलू निकले


क्या मुसीबत हाथ ख़ाली जाएगी... जान ले कर ही ये साली जाएगी


जो न करना हो वही काम तुम्हारे लिए है... मेरे हिस्से का भी आराम तुम्हारे लिए है


चढ़ा हुआ था वो दरिया अगर हमारे लिए... तो देखते ही रहे क्यूँ उतर नहीं गए हम


तारीकी के रात अज़ाब ही क्या कम थे... दिन निकला तो सूरज भी सफ़्फ़ाक हुआ

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