'बस्तियाँ कुछ हुईं वीरान तो मातम कैसा', आल-ए-अहमद सुरूर के शेर

Siraj Mahi
Oct 16, 2023

बस्तियाँ कुछ हुईं वीरान तो मातम कैसा... कुछ ख़राबे भी तो आबाद हुआ करते हैं

आज पी कर भी वही तिश्ना-लबी है साक़ी... लुत्फ़ में तेरे कहीं कोई कमी है साक़ी

साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन... तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है

आती है धार उन के करम से शुऊर में... दुश्मन मिले हैं दोस्त से बेहतर कभी कभी

हम जिस के हो गए वो हमारा न हो सका... यूँ भी हुआ हिसाब बराबर कभी कभी

लोग माँगे के उजाले से हैं ऐसे मरऊब... रौशनी अपने चराग़ों की बुरी लगती है

अब धनक के रंग भी उन को भले लगते नहीं... मस्त सारे शहर वाले ख़ून की होली में थे

जो तिरे दर से उठा फिर वो कहीं का न रहा... उस की क़िस्मत में रही दर-बदरी कहते हैं

हुस्न काफ़िर था अदा क़ातिल थी बातें सेहर थीं... और तो सब कुछ था लेकिन रस्म-ए-दिलदारी न थी

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