"वफ़ा तुझ से ऐ बेवफ़ा चाहता हूं, मिरी सादगी देख क्या चाहता हूं"

Siraj Mahi
Jun 15, 2024

ख़याल
आप को आता रहा मेरे सताने का ख़याल... सुल्ह से अच्छी रही मुझ को लड़ाई आप की

ख़फ़ा
मिलते हैं इस अदा से कि गोया ख़फ़ा नहीं... क्या आप की निगाह से हम आश्ना नहीं

आरज़ू
हम क्या करें अगर न तिरी आरज़ू करें... दुनिया में और भी कोई तेरे सिवा है क्या

नीयत
बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी... बादल जो नज़र आए बदली मेरी नीयत भी

अयादत
देखने आए थे वो अपनी मोहब्बत का असर... कहने को ये है कि आए हैं अयादत कर के

याद
नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती... मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

मुद्दतें
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह... मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

महफ़िल
तेरी महफ़िल से उठाता ग़ैर मुझ को क्या मजाल... देखता था मैं कि तू ने भी इशारा कर दिया

ख़बर
ख़ू समझ में नहीं आती तिरे दीवानों की... दामनों की न ख़बर है न गिरेबानों की

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