इस्लाम में हराम है आत्महत्या; हमेशा जहन्नम की आग में जलेगा खुदकुशी करने वाला
Siraj Mahi
Oct 31, 2023
इस्लाम में खुदकुशी को हराम करार दिया गया है. इस्लाम में माना जाता है कि इंसान का अपना जिस्म और उसकी जिंदगी उसकी अपनी नहीं, बल्कि यह अल्लाह की दी हुई अमानत है.
बाकी नेमतों की तरह ज़िन्दगी भी इंसान के लिए अल्लाह की दी हुई एक नेमत है. ये किसी इंसान को एक बार मिलती है. इसे में उसे अपने रब को राज़ी कर वापस उसके पास जाना होता है.
इसलिए इस्लाम में हुक्म दिया गया है कि अपनी जिंदगी और अपने जिस्म की हिफाजत करो. यही वजह है कि इस्लाम ने खुदकुशी को हराम करार दिया है.
इस्लाम किसी भी शख्स को अपनी जान लेने का हरगिज हक नहीं देता. यानी जब इंसान अपनी जान का मालिक ही नहीं है, तो फिर वो अपनी जान लेने के फैसला कैसे कर सकता है.
जिस तरह से इस्लाम में किसी इंसान का कत्ल करना पूरी इंसानियत का कत्ल करने के बराबर है, उसी तरह से अपनी जिंदगी को खत्म करना अल्लाह के नजदीक न पसंदीदा अमल है.
इस बारे में कुरान में जिक्र है कि "और अपने ही हाथों खुद को हलाकत में न डालो, और साहेबान-ए-एहसान बनो, बेशक अल्लाह एहसान वालों से मोहब्बत करता है." (सूरा: बकर, 195:2)
कुरान में हैं कि "और अपनी जानों को मत हलाक करो, बेशक अल्लाह तुम पर मेहरबान है. और जो कोई जुल्म से ऐसा करेगा हम उसे (दोजख) की आग में डाल देंगे, और यह अल्लाह पर बिल्कुल आसान है." (सूना निसा, 4:29-30)
प्रोफेट मोहम्मद (स.) ने खुदकुशी करने वाले के बारे में कहा है कि "वह दोजख में जाएगा, हमेशा उसमें गिरता रहेगा और हमेशा हमेशा वहीं रहेगा."
उलेमा बताते हैं कि इंसान की ज़िन्दगी में मुश्किलें, नफा और नुक्सान अल्लाह की तरफ से आते हैं. इसलिए हर हाल में उसे लड़ना चाहिए.