Urdu Poetry in Hindi: "अब तो ये भी नहीं रहा एहसास..."

Siraj Mahi
Oct 05, 2024

एक ऐसा भी वक़्त होता है, मुस्कुराहट भी आह होती है

मैं जहाँ हूँ तिरे ख़याल में हूँ, तू जहाँ है मिरी निगाह में है

अब तो ये भी नहीं रहा एहसास, दर्द होता है या नहीं होता

भुलाना हमारा मुबारक मुबारक, मगर शर्त ये है न याद आईएगा

आदमी के पास सब कुछ है मगर, एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं

मोहब्बत में हम तो जिए हैं जिएँगे, वो होंगे कोई और मर जाने वाले

तुझे भूल जाना तो मुमकिन नहीं है, मगर भूल जाने को जी चाहता है

मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं, कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं

बहुत हसीन सही सोहबतें गुलों की मगर, वो ज़िंदगी है जो काँटों के दरमियाँ गुज़रे

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