'हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है', जिगर मुरादाबादी के शेर

Siraj Mahi
Oct 29, 2023


मिल के भी जो कभी नहीं मिलता... टूट कर दिल उसी से मिलता है


इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा... आदमी काम का नहीं होता


मुझ से लगे हैं इश्क़ की अज़्मत को चार चाँद... ख़ुद हुस्न को गवाह किए जा रहा हूँ मैं


हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं... हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं


हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है... रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है


दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद... अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद


कोई मस्त है कोई तिश्ना-लब तो किसी के हाथ में जाम है... मगर इस पे कोई करे भी क्या ये तो मय-कदे का निज़ाम है


सब जिस को असीरी कहते हैं वो तो है अमीरी ही लेकिन... वो कौन सी आज़ादी है यहाँ जो आप ख़ुद अपना दाम नहीं

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