'तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं'; जिगर मुरादाबादी के चुनिंदा शेर

Siraj Mahi
Sep 14, 2023

दोनों हाथों से लूटती है हमें... कितनी ज़ालिम है तेरी अंगड़ाई

हसीं तेरी आँखें हसीं तेरे आँसू... यहीं डूब जाने को जी चाहता है

आदमी आदमी से मिलता है... दिल मगर कम किसी से मिलता है

तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं... हाँ मुझी को ख़राब होना था

उस ने अपना बना के छोड़ दिया... क्या असीरी है क्या रिहाई है

इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा... आदमी काम का नहीं होता

यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर... जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं

तिरे जमाल की तस्वीर खींच दूँ लेकिन... ज़बाँ में आँख नहीं आँख में ज़बान नहीं

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं... हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

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