मालूम
पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था... जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा

Siraj Mahi
Jun 05, 2024

बचपन
मेरा बचपन भी साथ ले आया... गाँव से जब भी आ गया कोई

बसना
रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए... रोज़ धरती में समा जाते हैं

दफ़्न
बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें... मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले

समुंदर
कोई कहता था समुंदर हूँ मैं... और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं

लौटना
रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे... फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ

सलाम
बहार आए तो मेरा सलाम कह देना... मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

इंक़लाब
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले... उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

ख़ता
की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ... थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ

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