"तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई" कैफी आजमी के शेर

Siraj Mahi
Aug 25, 2024

रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए, रोज़ धरती में समा जाते हैं

बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें, मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था, जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा

अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ, वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए, इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए

की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ, थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क, यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे, उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

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