'इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े'; कैफी आजमी के शेर

Siraj Mahi
Sep 24, 2023

रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए... रोज़ धरती में समा जाते हैं

कोई कहता था समुंदर हूँ मैं... और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे... फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ

बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें... मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े... हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले... उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क... यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ... थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना... मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

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