"दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़, तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो"

Siraj Mahi
Mar 17, 2024


ज़रा देख आइना मेरी वफ़ा का... कि तू कैसा था अब कैसा लगे है


इश्क़ में मौत का नाम है ज़िंदगी... जिस को जीना हो मरना गवारा करे


वो कहते हैं हर चोट पर मुस्कुराओ... वफ़ा याद रक्खो सितम भूल जाओ


मरना तो बहुत सहल सी इक बात लगे है... जीना ही मोहब्बत में करामात लगे है


दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए... ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है


न जाने रूठ के बैठा है दिल का चैन कहाँ... मिले तो उस को हमारा कोई सलाम कहे


गुज़र जाएँगे जब दिन गुज़रे आलम याद आएँगे... हमें तुम याद आओगे तुम्हें हम याद आएँगे


ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी... मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी


अपना लहू भर कर लोगों को बाँट गए पैमाने लोग... दुनिया भर को याद रहेंगे हम जैसे दीवाने लोग

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