"कुछ इस तरह तिरी उल्फ़त में काट दी मैं ने"; मयकश अकबराबादी

Siraj Mahi
Apr 26, 2024


पहुँच ही जाएगा ये हाथ तेरी ज़ुल्फ़ों तक... यूँही जुनूँ का अगर सिलसिला दराज़ रहा


थी जुनूँ-आमेज़ अपनी गुफ़्तुगू... बात मतलब की भी लेकिन कह गए


नज़'अ तक दिल उस को दोहराया किया... इक तबस्सुम में वो क्या कुछ कह गए


तिरी ज़ुल्फ़ों को क्या सुलझाऊँ ऐ दोस्त... मिरी राहों में पेच-ओ-ख़म बहुत हैं


मिरे फ़ुसूँ ने दिखाई है तेरे रुख़ की सहर... मिरे जुनूँ ने बनाई है तेरे ज़ुल्फ़ की शाम


आप की मेरी कहानी एक है... कहिए अब मैं क्या सुनाऊँ क्या सुनूँ


कुछ इस तरह तिरी उल्फ़त में काट दी मैं ने... गुनाहगार हुआ और न पाक-बाज़ रहा


हम ने लाले की तरह इस दौर में... आँख खोली थी कि देखा दिल का ख़ूँ


ये मस्लक अपना अपना है ये फ़ितरत अपनी अपनी है... जलाओ आशियाँ तुम हम करेंगे आशियाँ पैदा

VIEW ALL

Read Next Story