'अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम'; मजरूह सुल्तानपुरी के मशहूर शेर

Siraj Mahi
Sep 12, 2023

कुछ बता तू ही नशेमन का पता... मैं तो ऐ बाद-ए-सबा भूल गया

गुलों से भी न हुआ जो मिरा पता देते... सबा उड़ाती फिरी ख़ाक आशियाने की

तिरे सिवा भी कहीं थी पनाह भूल गए... निकल के हम तिरी महफ़िल से राह भूल गए

कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा... हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा

अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम... उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम

बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना... किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते

बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने... ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके

तुझे न माने कोई तुझ को इस से क्या मजरूह... चल अपनी राह भटकने दे नुक्ता-चीनों को

अलग बैठे थे फिर भी आँख साक़ी की पड़ी हम पर... अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आएँगे

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